सिंधु जल समझौते के निलंबन को लेकर पाकिस्तान ने मंगलवार को एक अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस आयोजित की। सम्मेलन में पाकिस्तान के कई नेताओं ने सिंधु जल संधि को दोबारा लागू करने की मांग की। कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने सीधे तौर पर भारत का नाम लेने से परहेज किया और अपने संबोधनों में “ताकतवर देश” जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया।
सम्मेलन में पाकिस्तान के सांसद मुसादिक मलिक ने कहा कि कोई ताकतवर देश अपनी इच्छा से किसी अंतरराष्ट्रीय समझौते को रद्द नहीं कर सकता। उन्होंने कहा कि सिंधु जल समझौते ने दोनों परमाणु शक्तियों के बीच तीन युद्धों के बावजूद अपना अस्तित्व बनाए रखा। उनके अनुसार, अंतरराष्ट्रीय कानून की वास्तविक परीक्षा तब होती है जब वह किसी कमजोर देश की रक्षा कर सके।
मुसादिक मलिक ने अपने संबोधन में कहा कि यदि कोई देश एकतरफा किसी संधि को निलंबित कर दे, तो इससे अंतरराष्ट्रीय संधियों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि इतिहास में ऐसे रवैये के गंभीर परिणाम देखने को मिले हैं।
सम्मेलन में पाकिस्तान के उपप्रधानमंत्री इशाक डार ने भी सिंधु जल संधि के निलंबन का विरोध किया। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान इस फैसले को स्वीकार नहीं करता और उसके अनुसार यह संधि अब भी वैध और प्रभावी है। उन्होंने दावा किया कि जिस संधि में एकतरफा निलंबन या समाप्ति का प्रावधान न हो, उसे कोई भी पक्ष अकेले निलंबित नहीं कर सकता। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि दोनों देशों ने 19 सितंबर 1960 को सिंधु जल संधि पर हस्ताक्षर किए थे।
पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के अध्यक्ष बिलावल भुट्टो जरदारी ने भी सम्मेलन को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि सिंधु नदी किसी प्रकार की सौदेबाजी या बातचीत का विषय नहीं है। उन्होंने जलमार्गों के “हथियार के रूप में इस्तेमाल” के खिलाफ एक नए अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का प्रस्ताव भी रखा। उनके अनुसार, वैश्विक स्तर पर यह सिद्धांत स्थापित होना चाहिए कि जलमार्गों का उपयोग किसी देश पर दबाव बनाने के साधन के रूप में नहीं किया जा सकता।
अपने संबोधन में बिलावल भुट्टो जरदारी ने सिंधु नदी की तुलना स्ट्रेट ऑफ होर्मुज, स्वेज नहर, पनामा नहर, नील नदी, टिगरिस नदी और यूफ्रेटिस नदी जैसे प्रमुख जलमार्गों से की। उन्होंने कहा कि इन सभी जलमार्गों पर वैश्विक स्तर पर चर्चा होनी चाहिए। उनका कहना था कि जिस प्रकार होर्मुज जलडमरूमध्य में बाधा आने पर क्षेत्रीय शांति प्रभावित हो सकती है, उसी तरह सिंधु जल संधि की बहाली के बिना भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्षविराम लंबे समय तक कायम रहना कठिन हो सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान का कहना है कि सिंधु जल समझौते के निलंबन के बाद उसे भारतीय नदियों के हाइड्रोलॉजिकल डेटा की उपलब्धता नहीं हो रही है। उसके अनुसार, इससे बाढ़ और सूखे जैसी परिस्थितियों का आकलन करना कठिन हो सकता है। साथ ही, पाकिस्तान का दावा है कि उसकी कृषि और जलविद्युत उत्पादन का बड़ा हिस्सा सिंधु नदी प्रणाली पर निर्भर है।
