नई दिल्ली: बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान की हालिया चीन यात्रा और विदेश मंत्री खलीलुर रहमान के बयान के बाद भारत के लिए नई रणनीतिक चिंताएं सामने आती दिखाई दे रही हैं। मोहम्मद यूनुस के कार्यकाल में दोनों देशों के रिश्ते पहले ही निचले स्तर पर पहुंच चुके थे। चुनाव के बाद तारिक रहमान के सत्ता में आने से संबंधों में सुधार की उम्मीद जताई जा रही थी, लेकिन चीन को लेकर बांग्लादेश का मौजूदा रुख भारत के लिए चिंता का विषय माना जा रहा है।
बांग्लादेशी मीडिया की रिपोर्ट के अनुसार, शनिवार को आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में विदेश मंत्री खलीलुर रहमान से प्रधानमंत्री तारिक रहमान की चीन यात्रा के लाभ के बारे में पूछा गया। इस पर उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री “भीख का झोला लेकर” चीन नहीं गए थे, बल्कि दोनों देशों के भविष्य के संबंधों की दिशा तय करने के लिए गए थे। उन्होंने इस तरह के सवालों को “शर्मिंदगी वाला” बताते हुए कहा कि बांग्लादेश अब एक अलग स्तर पर पहुंच चुका है।
विदेश मंत्री ने दावा किया कि चीन के साथ बांग्लादेश के संबंध अब “व्यापक रणनीतिक सहकारी साझेदारी” से आगे बढ़कर “साझा भविष्य वाला बांग्लादेश-चीन समुदाय” के स्तर तक पहुंच गए हैं, जिसे चीन के साथ द्विपक्षीय सहयोग का सर्वोच्च स्तर बताया गया।
इसी बीच रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि तारिक रहमान सरकार ने मोंगला पोर्ट के पास प्रस्तावित इकोनॉमिक जोन के विकास की जिम्मेदारी चीन की सरकारी कंपनी को सौंपने का फैसला किया है। बताया गया है कि यह जमीन पहले भारतीय इकोनॉमिक जोन के लिए निर्धारित थी, जिसे बाद में मोहम्मद यूनुस सरकार ने सूची से हटा दिया था।
प्रस्तावित इकोनॉमिक जोन मोंगला बंदरगाह के पास लगभग 110 एकड़ क्षेत्र में विकसित किया जाना है। मोंगला पोर्ट चटगांव के बाद बांग्लादेश का दूसरा सबसे बड़ा और व्यस्त बंदरगाह है। यह क्षेत्र भारत के सुंदरबन से सटा हुआ है और कोलकाता से करीब 188 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, जिससे इसका सामरिक महत्व और बढ़ जाता है।
रिपोर्ट के अनुसार, मोहम्मद यूनुस के कार्यकाल में भी बांग्लादेश ने चिकन नेक कॉरिडोर और समुद्री क्षेत्र से जुड़े मुद्दों पर अपने विचार सार्वजनिक किए थे। यूनुस ने कहा था कि पूर्वोत्तर भारत जमीन से घिरा क्षेत्र है और उस इलाके के लिए बांग्लादेश ही बंगाल की खाड़ी तक पहुंच का “समुद्र का संरक्षक” है। ऐसे में मोंगला बंदरगाह तक चीन की संभावित पहुंच को भारत के लिए सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण घटनाक्रम के रूप में देखा जा रहा है।
