भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने 5 अगस्त 2026 को अपनी मौद्रिक नीति (Monetary Policy) की घोषणा करते हुए रेपो रेट को लगातार चौथी बार 5.25% पर स्थिर रखने का फैसला किया है। इसके साथ ही केंद्रीय बैंक ने अपना ‘Neutral Stance’ भी बरकरार रखा है। यानी भविष्य में आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार ब्याज दरों में बढ़ोतरी या कटौती, दोनों विकल्प खुले रहेंगे।
हालांकि इस बार ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया गया, लेकिन RBI ने महंगाई, आर्थिक विकास, वैश्विक जोखिम और निवेश से जुड़े कई महत्वपूर्ण संकेत दिए हैं।
रेपो रेट में बदलाव नहीं, EMI पर राहत
RBI के फैसले का सीधा असर करोड़ों लोन धारकों पर पड़ा है। रेपो रेट स्थिर रहने से होम लोन, कार लोन, पर्सनल लोन और एजुकेशन लोन की EMI में फिलहाल कोई बदलाव नहीं होगा। जिन ग्राहकों के लोन फ्लोटिंग ब्याज दर पर हैं, उन्हें अभी राहत मिलती रहेगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा परिस्थितियों में RBI ने महंगाई और आर्थिक विकास के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए यह फैसला लिया है।
RBI ने बताईं तीन बड़ी चिंताएं
मौद्रिक नीति की घोषणा के दौरान RBI गवर्नर ने भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने मौजूद तीन प्रमुख जोखिमों का उल्लेख किया।
पहली चिंता पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव है, जिसका असर कच्चे तेल की कीमतों और वैश्विक व्यापार पर पड़ सकता है।
दूसरी चिंता एल-नीनो और मानसून से जुड़ी अनिश्चितता है। जुलाई में स्थिति सामान्य रही, लेकिन अगस्त और सितंबर का मौसम कृषि उत्पादन और खाद्य महंगाई के लिए अहम माना जा रहा है।
तीसरी चिंता अमेरिका की व्यापार और टैरिफ नीतियों से जुड़ी वैश्विक अनिश्चितता है, जो अंतरराष्ट्रीय व्यापार और निवेश प्रवाह को प्रभावित कर सकती है।
महंगाई और GDP पर RBI का अनुमान
RBI ने चालू वित्त वर्ष के लिए महंगाई (Inflation) का अनुमान 5% पर बरकरार रखा है। केंद्रीय बैंक का मानना है कि फिलहाल खाद्य और ईंधन की कीमतें महंगाई की सबसे बड़ी वजह बनी हुई हैं, जबकि कोर इंफ्लेशन अपेक्षाकृत नियंत्रित है।
वहीं, GDP ग्रोथ का अनुमान बढ़ाकर 6.7% कर दिया गया है। RBI का कहना है कि यदि वैश्विक परिस्थितियां सामान्य रहती हैं तो वित्त वर्ष की चौथी तिमाही तक महंगाई में कुछ राहत देखने को मिल सकती है।
विदेशी मुद्रा भंडार और व्यापार घाटे पर नजर
RBI ने बताया कि भारत के पास लगभग 680 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है, जो करीब 11 महीने के आयात को कवर करने के लिए पर्याप्त माना जा रहा है।
हालांकि, व्यापार घाटा (Trade Deficit) और शुद्ध विदेशी निवेश (Net FDI) को लेकर चिंता बनी हुई है। कच्चे तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स और सोने के बड़े आयात से आयात बिल पर लगातार दबाव बना हुआ है।
शेयर बाजार और रुपये पर क्या होगा असर?
विशेषज्ञों के अनुसार फिलहाल शेयर बाजार पूरी तरह कंपनियों के तिमाही नतीजों (Result Driven Market) पर निर्भर है। इसलिए आने वाले दिनों में बाजार में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है।
रुपये की बात करें तो डॉलर के मुकाबले 95 रुपये के आसपास का स्तर फिलहाल नया सामान्य माना जा रहा है। RBI के हस्तक्षेप, FCNR जमा और कच्चे तेल की कीमतों में नरमी से रुपये को कुछ सहारा मिला है, लेकिन निकट भविष्य में बड़ी मजबूती की संभावना फिलहाल कम दिखाई दे रही है।
सोना और FII निवेश पर क्या बोले विशेषज्ञ?
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि लंबी अवधि में सोने की कीमतों में तेजी की संभावना बनी हुई है। डॉलर इंडेक्स, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दरें आने वाले समय में सोने की दिशा तय करेंगी।
वहीं, विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की वापसी भी धीरे-धीरे शुरू होती दिखाई दे रही है। हालांकि फिलहाल उनकी खरीदारी चुनिंदा बड़े शेयरों तक ही सीमित है।
RBI की अगस्त 2026 की मौद्रिक नीति में भले ही रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं किया गया हो, लेकिन केंद्रीय बैंक ने साफ संकेत दिया है कि आने वाले महीनों में महंगाई, मानसून, कच्चे तेल की कीमतें और वैश्विक घटनाक्रम भारतीय अर्थव्यवस्था और वित्तीय बाजारों की दिशा तय करेंगे। ऐसे में निवेशकों और आम लोगों के लिए फिलहाल ‘वेट एंड वॉच’ की रणनीति अपनाना बेहतर माना जा रहा है।
