मेटा के ग्लोबल अफेयर्स प्रमुख जोएल कापलान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वीडियो फेसबुक से हटाए जाने की घटना पर माफी मांगते हुए इसे तकनीकी गलती बताया है। उन्होंने कहा कि कंपनी इस मामले को गंभीरता से ले रही है और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए अपने सिस्टम में आवश्यक सुधार करेगी। सरकार की कड़ी आपत्ति के बाद मेटा के शीर्ष नेतृत्व ने आधिकारिक रूप से खेद व्यक्त किया है।
इस मामले ने तब तूल पकड़ा जब सूचना प्रौद्योगिकी पर संसदीय स्थायी समिति ने मेटा के सीईओ मार्क जकरबर्ग से सार्वजनिक माफी की मांग की। समिति ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का Gen Z और छात्रों से जुड़ा वीडियो करीब पांच से छह घंटे तक फेसबुक पर उपलब्ध नहीं था, जो बेहद गंभीर मामला है। समिति के अध्यक्ष निशिकांत दुबे ने कहा कि यदि निर्धारित समय के भीतर माफी नहीं मांगी जाती, तो कंपनी को मिलने वाली कानूनी सुरक्षा और अन्य छूटों पर पुनर्विचार किया जा सकता है।
संसदीय समिति ने गूगल इंडिया के खिलाफ भी कार्रवाई की सिफारिश की है। समिति का आरोप है कि धोखाधड़ी वाले निवेश ऐप्स के जरिए निवेशकों को लाखों रुपये का नुकसान हुआ और ऐसे मामलों में प्लेटफॉर्म की जवाबदेही तय होनी चाहिए। समिति चाहती है कि केंद्र सरकार इस मामले में भी सख्त कदम उठाए।
सरकारी सूत्रों के अनुसार, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अधिकारियों और मेटा के वरिष्ठ प्रतिनिधियों के बीच हुई बैठक में चाइल्ड सेक्सुअल एब्यूज मटीरियल (CSAM), डीपफेक कंटेंट और कंटेंट मॉडरेशन की कमियों पर भी चर्चा हुई। सूत्रों का कहना है कि मेटा ने इन मुद्दों पर अपनी कमियां स्वीकार करते हुए खेद जताया और भरोसा दिलाया कि प्लेटफॉर्म की निगरानी व्यवस्था को और मजबूत बनाया जाएगा। हालांकि, सूत्रों के मुताबिक इस बैठक में प्रधानमंत्री मोदी का वीडियो हटाने का मुद्दा औपचारिक चर्चा का हिस्सा नहीं था।
बैठक के दौरान सरकार ने स्पष्ट किया कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म बच्चों के शोषण से जुड़े कंटेंट से विज्ञापन के जरिए कमाई नहीं कर सकते और साथ ही आईटी कानून के तहत मिलने वाली ‘सेफ हार्बर’ सुरक्षा का दावा भी नहीं कर सकते। अधिकारियों ने मेटा से भारतीय कानूनों के पालन, कंटेंट मॉडरेशन और प्लेटफॉर्म की जवाबदेही को लेकर कई सवाल पूछे।
सूत्रों के अनुसार, मेटा ने यह भी स्वीकार किया कि कुछ श्रेणी के कंटेंट को एल्गोरिदम के जरिए अधिक पहुंच (बूस्ट) दी गई थी और इस प्रक्रिया में हुई कमियों पर कंपनी ने अफसोस जताया। इस पूरे मामले पर आगे की समीक्षा के लिए मेटा के अधिकारियों को एक और बैठक के लिए बुलाया गया है।
सरकारी अधिकारियों का मानना है कि आईटी एक्ट की धारा 79 के तहत मिलने वाली ‘सेफ हार्बर’ सुरक्षा केवल निष्क्रिय मध्यस्थों (Intermediaries) के लिए है। उनका तर्क है कि मेटा के एल्गोरिदम सक्रिय रूप से यह तय करते हैं कि कौन-सा कंटेंट किस उपयोगकर्ता तक पहुंचेगा, इसलिए कंपनी को साधारण मध्यस्थ नहीं माना जा सकता। इसी आधार पर अधिकारियों ने संकेत दिया है कि मेटा की कानूनी सुरक्षा की स्थिति की भी समीक्षा की जा सकती है।
