वॉशिंगटन डी.सी.: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने H-1B वीजा के नियमों में बड़ा बदलाव किया है। अब H-1B वीजा आवेदन के साथ 100,000 डॉलर (लगभग ₹88 लाख) से अधिक की नई फीस देना अनिवार्य होगा। इस कदम का सीधा असर भारत सहित विदेशी प्रोफेशनल्स को अमेरिकी कंपनियों में नौकरी दिलाने पर पड़ेगा।
व्हाइट हाउस के स्टाफ सेक्रेटरी विल शार्फ ने इस फैसले का बचाव करते हुए कहा कि H-1B वीजा प्रोग्राम का सबसे ज्यादा दुरुपयोग हुआ है। उन्होंने कहा कि इस नई फीस से यह सुनिश्चित होगा कि अमेरिका में आने वाले विदेशी कर्मचारी “वास्तव में बहुत ही उच्च योग्य हैं और उन्हें अमेरिकी कर्मचारियों से बदला नहीं जा सकता।”
छोटे टेक फर्मों और स्टार्टअप्स पर पड़ेगा असर
नई फीस से विशेष रूप से छोटे टेक फर्म और स्टार्टअप्स पर भारी वित्तीय दबाव पड़ सकता है। हालांकि, अमेज़न, माइक्रोसॉफ्ट और मेटा जैसी बड़ी कंपनियों के लिए यह कोई बड़ी समस्या नहीं होगी, क्योंकि वे शीर्ष पेशेवरों को लाने के लिए भारी खर्च करती रहती हैं।
अमेरिकी वाणिज्य सचिव हॉवर्ड लूटनिक ने कहा कि इस नीति का उद्देश्य अमेरिकी छात्रों और कर्मचारियों को काम के लिए तैयार करना है, न कि विदेशी कर्मचारियों को लाकर अमेरिकी नौकरी लेना।
सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे भारतीय प्रोफेशनल्स
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले साल H-1B वीजा पाने वालों में 71% भारतीय पेशेवर थे, जबकि चीन 11.7% के साथ दूसरे स्थान पर था। H-1B वीजा के लगभग दो-तिहाई पद कंप्यूटिंग और आईटी क्षेत्र में होते हैं, लेकिन इसका उपयोग इंजीनियरों, शिक्षकों और हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स द्वारा भी किया जाता है।
ट्रंप प्रशासन का यह कदम उनके व्यापक इमिग्रेशन क्रैकडाउन का एक हिस्सा है। मौजूदा सिस्टम में, H-1B वीजा आवेदन शुल्क कुछ हजार डॉलर से शुरू होता है, जिसे पूरी तरह से कंपनियों द्वारा वहन किया जाता है। नए नियम से यह प्रक्रिया कई कंपनियों और उम्मीदवारों के लिए बेहद महंगी और मुश्किल हो जाएगी।
President Trump Signs Executive Orders, Sep. 19, 2025 https://t.co/w4tVxbSTY0
— The White House (@WhiteHouse) September 19, 2025
