Strait of Hormuz Crisis: अमेरिका और ईरान के बीच मंगलवार से शुरू होने वाली प्रस्तावित शांति वार्ता पर अनिश्चितता के काले बादल मंडरा रहे हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में अमेरिकी नौसेना द्वारा ईरानी मालवाहक जहाज को जब्त किए जाने के बाद तेहरान ने वार्ता में शामिल होने को लेकर चुप्पी साध ली है। ईरान ने अमेरिका पर शांति प्रयासों के प्रति गंभीर न होने का आरोप लगाया है, जबकि मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे पाकिस्तान ने कूटनीतिक प्रयासों को तेज कर दिया है।
जहाज की जब्ती और बढ़ता सैन्य गतिरोध
तनाव की ताजा वजह रविवार को हुई वह घटना है जिसमें अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने चीन से लौट रहे एक ईरानी मालवाहक जहाज को छह घंटे की तनातनी के बाद अपने कब्जे में ले लिया। अमेरिकी मरीन ने फायरिंग कर जहाज के इंजन को निष्क्रिय कर दिया और हेलीकॉप्टर के जरिए उस पर नियंत्रण कर लिया। ईरान की ‘इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर’ (IRGC) ने इसे ‘सशस्त्र समुद्री डकैती’ करार देते हुए चेतावनी दी है। हालांकि, जहाज पर मौजूद परिवारों की सुरक्षा को देखते हुए फिलहाल ईरान ने जवाबी कार्रवाई को सीमित रखा है। इस घटनाक्रम के बाद वैश्विक तेल बाजार में हलचल तेज हो गई है और ब्रेंट क्रूड के दाम 95 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गए हैं।
पाकिस्तान की कूटनीतिक दौड़-धूप
शांति वार्ता को खटाई में पड़ता देख पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर और विदेश मंत्री इशाक डार लगातार दोनों पक्षों के संपर्क में हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, फील्ड मार्शल मुनीर ने राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप से फोन पर बात कर सुझाव दिया है कि ईरानी बंदरगाहों की अमेरिकी नाकेबंदी वार्ता की राह में सबसे बड़ा रोड़ा है। हालांकि, राष्ट्रपति ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से इस तरह के किसी सुझाव मिलने से इनकार किया है, लेकिन पाकिस्तान अब भी वार्ता को लेकर आश्वस्त नजर आ रहा है। पाकिस्तान के गृह मंत्री मोहसिन नकवी ने भी ईरानी और अमेरिकी राजदूतों के साथ अलग-अलग बैठकें कर माहौल को ठंडा करने की कोशिश की है।
ईरान का कड़ा रुख और अमेरिकी शर्तें
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने दो टूक कहा है कि अमेरिकी धमकियां और जहाजों पर कब्जा करना वॉशिंगटन की अगंभीरता को दर्शाता है। ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने स्पष्ट कर दिया है कि तेहरान किसी भी समयसीमा या चेतावनियों के दबाव में आकर अपने राष्ट्रीय हितों से समझौता नहीं करेगा। ईरान का दावा है कि उसकी रक्षात्मक मिसाइल क्षमता और अमेरिकी नाकेबंदी वार्ता का हिस्सा नहीं हो सकते।
दूसरी ओर, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप अपने रुख पर अडिग हैं। उन्होंने साफ किया है कि ईरान के साथ किसी भी स्थाई समझौते के लिए तेहरान को अपना परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह छोड़ना होगा। ट्रंप ने यह भी स्पष्ट किया कि ईरान के साथ चल रहे इस संघर्ष में इजरायल की कोई भूमिका नहीं है और यह पूरी तरह से परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने की अमेरिकी नीति का हिस्सा है। ट्रंप ने संकेत दिया है कि यदि वार्ता में ठोस प्रगति होती है, तो वे ईरानी नेतृत्व से मिलने को तैयार हैं, बशर्ते ईरान समझदारी दिखाए।
वैश्विक प्रभाव और आगे की राह
इस सैन्य और कूटनीतिक गतिरोध का सीधा असर दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। तेल की बढ़ती कीमतों और अमेरिकी शेयर बाजार में गिरावट ने वैश्विक चिंता बढ़ा दी है। ईरान के सबसे बड़े तेल खरीदार चीन ने भी होर्मुज में सामान्य आवाजाही बहाल करने की अपील की है। अब सबकी नजरें पाकिस्तान के दौरे पर आने वाले अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल और ईरान के अंतिम फैसले पर टिकी हैं। यदि बुधवार तक कोई समाधान नहीं निकलता, तो क्षेत्र में युद्धविराम टूटने और पूर्ण युद्ध छिड़ने का खतरा वास्तविक हो सकता है।
