Iran-US Peace Deal: अमेरिका और ईरान के बीच पिछले तीन महीनों से जारी भीषण युद्ध अब आखिरकार थमने के कगार पर पहुंचता हुआ दिखाई दे रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और अन्य शीर्ष अंतरराष्ट्रीय अधिकारियों के हालिया बयानों से ऐसे मजबूत संकेत मिल रहे हैं कि दोनों देश एक ऐतिहासिक और बड़े शांति समझौते के बेहद करीब पहुंच चुके हैं।
कूटनीतिक गलियारों से आ रही खबरों के मुताबिक, इस शांति समझौते को इसी सप्ताह के अंत तक यूरोप के किसी देश में दोनों पक्षों द्वारा आधिकारिक तौर पर साइन (हस्ताक्षरित) किया जा सकता है। इस पूरे मामले में मध्यस्थता की महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने भी बड़ा दावा करते हुए कहा है कि शांति समझौते के अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण हिस्से पर दोनों पक्षों के बीच पूरी सहमति बन चुकी है। हालांकि, ईरान ने इस समझौते को लेकर अभी भी बेहद फूंक-फूंक कर कदम आगे बढ़ाने के संकेत दिए हैं और साफ कर दिया है कि वह अपनी राष्ट्रीय संप्रभुता और रेड लाइंस से किसी भी कीमत पर कोई समझौता नहीं करेगा।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने व्हाइट हाउस के ओवल ऑफिस में पत्रकारों से विशेष बातचीत करते हुए इस संभावित संधि को एक बहुत बड़ा सेटलमेंट करार दिया है। ट्रंप ने कहा कि संबंधित दस्तावेजों को अंतिम रूप दिए जाने के बाद अगले कुछ ही दिनों के भीतर संभवतः यूरोप में इस ऐतिहासिक समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए जाएंगे।
इसके साथ ही राष्ट्रपति ट्रंप ने यह दावा भी किया कि ईरानी सर्वोच्च नेता मुजतबा खामेनेई ने व्यक्तिगत रूप से इस शांति समझौते को अपनी मंजूरी दे दी है, क्योंकि हाल के अमेरिकी हमलों के कारण ईरान के बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान उठाना पड़ा है। ट्रंप ने वैश्विक अर्थव्यवस्था और बाजार को राहत देते हुए यह भी रेखांकित किया कि इस समझौते पर हस्ताक्षर होने के तुरंत बाद वैश्विक तेल आपूर्ति (ऑयल सप्लाई) के लिए सबसे महत्वपूर्ण माने जाने वाले जलमार्ग ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ को व्यापारिक जहाजों के लिए दोबारा पूरी तरह से खोल दिया जाएगा।
इस बड़ी कूटनीतिक सफलता के पीछे पाकिस्तान, कतर और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे देशों की बहुत बड़ी मध्यस्थता और भूमिका बताई जा रही है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पिछले दिनों जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर अब तक के सबसे भीषण और विनाशकारी सैन्य हमले की खुली धमकी दी थी, तब इन खाड़ी देशों और पाकिस्तान के शीर्ष नेताओं ने अमेरिकी प्रशासन से आपातकालीन बातचीत की थी। इन नेताओं ने ट्रंप को व्यापक सैन्य कार्रवाई रोकने और बातचीत की मेज पर आने के लिए राजी किया था।
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने बताया कि समझौते का अंतिम मसौदा (ड्राफ्ट) अब पूरी तरह तैयार है, जिसे ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने ‘इस्लामाबाद मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग’ का आधिकारिक नाम दिया है। सोशल मीडिया और मीडिया में लीक हुई रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस समझौते के मुख्य बिंदुओं में 30 दिनों के भीतर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को खोलना, अंतरराष्ट्रीय बैंकों में फ्रीज (जब्त) की गई ईरान की 24 अरब डॉलर की विशाल संपत्ति को दोबारा जारी करना और दोनों देशों के बीच परमाणु मुद्दों पर 60 दिनों की एक नई उच्च स्तरीय वार्ता शुरू करना शामिल है। हालांकि, अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने इन लीक हुई खबरों को फिलहाल ‘फेक’ यानी भ्रामक बताया है।
दूसरी तरफ, इस समझौते को लेकर ईरान और इजरायल ने अपना-अपना अलग और कड़ा रुख अख्तियार किया हुआ है। ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि हालांकि अधिकांश मसौदा तैयार जरूर हो चुका है, लेकिन ईरान सरकार ने अभी तक इस पर अपना अंतिम और निर्णायक फैसला नहीं लिया है। उन्होंने दोटूक लहजे में साफ किया कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर ईरान का संप्रभु और कानूनी नियंत्रण हमेशा की तरह बना रहेगा।
वहीं दूसरी ओर, इस संभावित समझौते के बीच इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने एक बार फिर हुंकार भरते हुए कड़ा बयान जारी किया है। नेतन्याहू ने कहा कि जब तक वे इजरायल के प्रधानमंत्री पद पर हैं, तब तक ईरान को कभी भी परमाणु हथियार हासिल करने नहीं दिया जाएगा। उन्होंने यह दावा भी किया कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और वे खुद ईरान के इस परमाणु खतरे के मुद्दे पर पूरी तरह से एकमत और एक साथ हैं।
यह संभावित शांति समझौता भारत के दृष्टिकोण से भी बेहद महत्वपूर्ण और राहत देने वाला माना जा रहा है। खाड़ी क्षेत्र और मध्य पूर्व में शांति बहाल होने से न केवल अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक समुद्री मार्ग पूरी तरह सुरक्षित हो जाएंगे, बल्कि समुद्र में मालवाहक कमर्शियल जहाजों पर काम करने वाले हजारों निर्दोष भारतीय नाविकों और क्रू मेंबर्स की जान भी पूरी तरह सुरक्षित हो सकेगी, जो पिछले कुछ समय से इस युद्ध के चलते लगातार हिंसक हमलों का शिकार हो रहे थे।
