Iran-UAE Tensions: खाड़ी क्षेत्र में पिछले दिनों भड़के भीषण सैन्य तनाव को लेकर एक बेहद चौंकाने वाली और बड़ी रिपोर्ट सामने आई है। वॉल स्ट्रीट जर्नल की एक एक्सक्लूसिव रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका और इजरायल के ईरान के खिलाफ लगभग 40 दिनों तक चले युद्ध में संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने न सिर्फ खुलकर हिस्सा लिया था, बल्कि ईरान के भीतर दर्जनों घातक हवाई हमलों को भी अंजाम दिया था।
रिपोर्ट के मुताबिक, यूएई की वायुसेना ने इन हमलों के लिए अमेरिका और इजरायल द्वारा साझा की गई बेहद सटीक और गोपनीय खुफिया जानकारी (इंटेलिजेंस) का इस्तेमाल किया था। यूएई की यह आक्रामक कार्रवाई दरअसल उसकी अपनी तेल और गैस सुविधाओं पर ईरान द्वारा किए गए मिसाइल और ड्रोन हमलों का करारा जवाब थी। हैरान करने वाली बात यह है कि यूएई ने इनमें से कुछ हवाई हमले अप्रैल की शुरुआत में अमेरिका द्वारा युद्धविराम (सीजफायर) की घोषणा किए जाने के बाद भी जारी रखे थे।
रिपोर्ट में विस्तार से बताया गया है कि ईरान ने युद्ध के दौरान यूएई की धरती और उसकी संपत्तियों को निशाना बनाते हुए 2,800 से अधिक मिसाइलों और सुसाइड ड्रोनों से भीषण हमला किया था। यह संख्या हालिया इतिहास में इजरायल समेत दुनिया के किसी भी अन्य देश पर दागी गई मिसाइलों की तुलना में सबसे अधिक थी। इस अभूतपूर्व और चौतरफा हमले से निपटने और अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए संयुक्त अरब अमीरात ने अमेरिका और इजरायल के साथ मिलकर एक मजबूत त्रिपक्षीय सैन्य मोर्चा बनाया और जवाबी कार्रवाई शुरू की।
यूएई के लड़ाकू विमानों ने रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य (स्ट्रेट ऑफ होर्मुज) में स्थित ईरान के केशम द्वीप, अबू मूसा द्वीप, प्रमुख तटीय शहर बंदर अब्बास और फारस की खाड़ी में स्थित लावान द्वीप पर मौजूद ईरान की विशाल तेल रिफाइनरियों और सैन्य ठिकानों को बमबारी कर मटियामेट कर दिया।
ईरान के असलुयेह गैस कॉम्प्लेक्स पर भीषण हमला और अंतरराष्ट्रीय विवाद
इस गुप्त सैन्य सहयोग के तहत यूएई और इजरायल ने मिलकर ईरान के सबसे बड़े और महत्वपूर्ण असलुयेह पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स (Asaluyeh Petrochemical Complex) पर एक विनाशकारी संयुक्त हमले को अंजाम दिया था। इस हमले के बाद ईरान के ऊर्जा ढांचे को भारी नुकसान पहुंचा, जिसकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तीखी निंदा भी हुई थी। इस हमले की गंभीरता को देखते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खुद इजरायल और सहयोगियों से ईरान की ऊर्जा व असैन्य सुविधाओं पर हमले तुरंत रोकने की सार्वजनिक अपील की थी।
उस दौरान जब इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से इस विनाशकारी हमले के बारे में सवाल किया गया था, तो उन्होंने कूटनीतिक रूप से यूएई का बचाव करते हुए दावा किया था कि इजरायल ने असलुयेह गैस कॉम्प्लेक्स के खिलाफ यह कार्रवाई अकेले ही की थी। हालांकि, ताजा रिपोर्ट बताती है कि इस युद्ध ने यूएई और इजरायल के बीच के सैन्य व रणनीतिक रिश्तों को एक नए और बेहद मजबूत स्तर पर पहुंचा दिया है, जिसके तहत इजरायल ने यूएई की सुरक्षा के लिए वहां अपनी अत्याधुनिक ‘आयरन डोम’ एयर डिफेंस बैटरियां और अपने सैनिक भी तैनात किए हैं।
इजरायली नेतृत्व के गुप्त दौरे और यूएई की सफाई
इस 40 दिनी युद्ध के दौरान इजरायल के शीर्ष सैन्य और खुफिया अधिकारी लगातार यूएई के गुप्त दौरों पर रहे। इन हाई-प्रोफाइल दौरों में इजरायली खुफिया एजेंसी ‘मोसाद’ के निदेशक डेविड बार्निया, आंतरिक सुरक्षा एजेंसी ‘शिन बेट’ के प्रमुख डेविड जिनी और आईडीएफ (IDF) के चीफ लेफ्टिनेंट जनरल अयाल जमीर जैसे नाम शामिल थे।
इन सबके अलावा, खुद इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भी यूएई का एक अत्यंत गोपनीय दौरा किया था, जिसकी पुष्टि बाद में खुद नेतन्याहू के कार्यालय ने की। हालांकि, इस मामले पर कूटनीतिक संतुलन बनाते हुए यूएई के विदेश मंत्रालय ने प्रधानमंत्री नेतन्याहू के किसी भी तरह के ‘गुप्त दौरे’ के दावे को सिरे से खारिज कर दिया है। यूएई प्रशासन का कहना है कि उसके इजरायल के साथ पूरी तरह से सामान्य और आधिकारिक राजनयिक संबंध हैं, इसलिए दोनों देशों के बीच किसी भी वार्ता के लिए इस तरह के गुप्त या छिपे हुए दौरों की कोई आवश्यकता नहीं है।
पड़ोसी खाड़ी देशों के रवैये से नाराज हुआ यूएई
इस पूरे क्षेत्रीय युद्ध के बीच खाड़ी देशों की आपसी दरार और गुटबाजी भी खुलकर सामने आ गई है। इस महीने की शुरुआत में संयुक्त अरब अमीरात के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जाएद ने सऊदी अरब और कतर सहित अपने अन्य पड़ोसी खाड़ी देशों के प्रति बेहद कड़ा रुख अपनाते हुए अपनी गहरी नाराजगी और असंतोष व्यक्त किया था।
यूएई के नेतृत्व की इस नाराजगी की मुख्य वजह यह थी कि जब ईरान यूएई पर हजारों मिसाइलें दाग रहा था, तब सऊदी अरब और कतर जैसे क्षेत्रीय सहयोगियों ने ईरान के खिलाफ जवाबी सैन्य कार्रवाई में यूएई के साथ किसी भी तरह का सैन्य तालमेल बिठाने या अपनी जमीन का इस्तेमाल करने देने से साफ इनकार कर दिया था, जिससे यूएई इस संकट में खुद को अरब जगत में अकेला महसूस कर रहा था।
