वॉशिंगटन: वैश्विक अर्थव्यवस्था पर मंडराते गंभीर ऊर्जा संकट और आसमान छूती ईंधन की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने एक अप्रत्याशित और चौंकाने वाला कदम उठाया है। अमेरिकी वित्त विभाग ने शुक्रवार देर रात एक महत्वपूर्ण घोषणा करते हुए बताया कि ईरान और रूस के तेल निर्यात पर लगे दीर्घकालिक प्रतिबंधों को अगले एक महीने के लिए अस्थायी रूप से हटा दिया गया है। ट्रंप प्रशासन का यह फैसला अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कच्चे तेल की आपूर्ति बहाल करने और मुद्रास्फीति के दबाव को कम करने की एक बड़ी कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
पिछले महीने ईरान के खिलाफ अमेरिका और इजरायल के बीच छिड़े युद्ध के बाद से वैश्विक तेल आपूर्ति श्रृंखला पूरी तरह चरमरा गई थी। इसके परिणामस्वरूप कच्चे तेल की कीमतों में आए तीव्र उछाल ने न केवल अमेरिकी बाजारों बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में भी हाहाकार मचा दिया था। शेयर बाजार में भारी गिरावट और बढ़ती महंगाई को रोकने के उद्देश्य से ट्रंप प्रशासन ने यह सामान्य लाइसेंस जारी किया है। यह निर्णय विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि इनमें से कई कड़े प्रतिबंध स्वयं राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल के दौरान ईरान की ‘दुर्भावनापूर्ण गतिविधियों’ के आरोप में लगाए थे, जबकि रूसी तेल पर प्रतिबंध 2022 में यूक्रेन युद्ध के बाद लागू हुए थे।
अमेरिकी विदेशी संपत्ति नियंत्रण कार्यालय (OFAC) द्वारा जारी नए आदेश के तहत, यह अस्थायी छूट 19 अप्रैल 2026 तक प्रभावी रहेगी। इस अवधि के दौरान ईरानी तेल की बिक्री, वितरण और अनलोडिंग पर किसी भी प्रकार का जुर्माना नहीं लगाया जाएगा। सबसे महत्वपूर्ण बदलाव यह है कि अब उन जहाजों से भी तेल खरीदा और उतारा जा सकेगा जो पहले से ‘ब्लैकलिस्ट’ या प्रतिबंधित श्रेणी में थे। यह लाइसेंस रूसी और ईरानी तेल को लक्षित करने वाले दस अलग-अलग कड़े प्रतिबंधों को शिथिल करता है, जिससे अंतरराष्ट्रीय खरीदारों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है।
वाशिंगटन के इस यू-टर्न के पीछे वर्तमान युद्ध की विभीषिका और वैश्विक ईंधन-खाद्य सुरक्षा पर मंडराता खतरा सबसे बड़ा कारण माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि हालांकि ट्रंप प्रशासन ने रणनीतिक रूप से यह कदम उठाया है, लेकिन यह केवल एक महीने के लिए है। 19 अप्रैल के बाद की स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि मध्य पूर्व में जारी युद्ध और वैश्विक तेल कीमतें किस दिशा में जाती हैं। फिलहाल, इस कदम से भारत और चीन जैसे बड़े तेल आयातक देशों सहित वैश्विक बाजारों को बड़ी राहत मिलने की संभावना है।
