अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य संघर्ष के कारण रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य (स्ट्रेट ऑफ होर्मुज) में पूरी तरह से नाकेबंदी जारी है। अमेरिकी नौसेना इस मार्ग से किसी भी देश के जहाजों और तेल टैंकरों को गुजरने की इजाजत नहीं दे रही है, जिससे पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) से होने वाली वैश्विक तेल आपूर्ति ठप होने की कगार पर पहुंच गई थी। हालांकि, इस बेहद कड़े प्रतिबंध और युद्ध के माहौल के बीच एक ऐसी चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई है जिसने अंतरराष्ट्रीय रक्षा विशेषज्ञों और शिपिंग जगत को हैरान कर दिया है।
वैश्विक शिपिंग डेटा और मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कई देशों के तेल और गैस के विशालकाय टैंकर बेहद गुपचुप तरीके से और अपने सर्विलांस सिस्टम को पूरी तरह बंद करके होर्मुज जलमार्ग को पार कर रहे हैं। जहाजों के रडार और ट्रैकिंग सिस्टम बंद होने के कारण उनकी सटीक लोकेशन या गुजरने के समय का पता लगा पाना नामुमकिन हो गया है। ऊर्जा विश्लेषकों का मानना है कि इस खुफिया तरीके से तेल की कुछ बड़ी खेप इस प्रतिबंधित रास्ते से लगातार निकाली जा रही हैं। यह प्रक्रिया इतनी गोपनीय है कि वर्तमान में यह अनुमान लगाना भी बेहद मुश्किल हो गया है कि अंतरराष्ट्रीय खरीदारों तक वास्तव में कितनी ऊर्जा की आपूर्ति पहुंच रही है। इस गुप्त रास्ते और तरीके का इस्तेमाल कर भारत, चीन और पाकिस्तान जैसे बड़े एशियाई देशों को कच्चे तेल की सप्लाई सुनिश्चित की जा रही है।
क्या है जहाजों का ‘डार्क मोड’ और कैसे हो रहा है इसका इस्तेमाल?
शिपिंग डेटा के गहन विश्लेषण से पता चला है कि ज्यादातर कमर्शियल तेल टैंकर अब ‘डार्क मोड’ (Dark Mode) रणनीति का सहारा ले रहे हैं। इसके तहत, जहाज जैसे ही होर्मुज जलडमरूमध्य को पार करने वाले होते हैं या फारस की खाड़ी में तेल लादने के लिए प्रवेश करते हैं, वे अपने ट्रांसपोंडर यानी एआईएस (AIS – ऑटोमैटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम) को पूरी तरह से बंद कर देते हैं। रडार बंद होने से वे वैश्विक निगरानी प्रणालियों की नजरों से ओझल हो जाते हैं, जो कि समुद्री यात्रा के नियमों के लिहाज से एक बेहद खतरनाक तरीका माना जाता है।
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा पत्रिका ‘ऑयल प्राइस’ के मुताबिक, पहले इस ‘डार्क मोड’ तकनीक का इस्तेमाल केवल ईरान से जुड़े जहाज अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों से बचने के लिए करते थे। लेकिन वर्तमान अमेरिकी नाकेबंदी के कारण अब आम और प्रतिष्ठित कमर्शियल जहाजों ने भी इस तरीके को अपना लिया है। मैरीटाइम इंटेलिजेंस फर्म ‘वोर्टेक्सा’ (Vortexa) के आंकड़ों से एक बड़ा खुलासा हुआ है कि हाल के हफ्तों में इस क्षेत्र से गुजरने वाले करीब 57 प्रतिशत जहाजों ने अपने ट्रांसपोंडर बंद रखे थे, और मई महीने में यह आंकड़ा रिकॉर्ड 65.2 प्रतिशत तक पहुंच गया।
ट्रैकिंग हुई असंभव, जोखिम कम करने का बना कमर्शियल जरिया
इकोनॉमिक टाइम्स (ET) की एक विशेष रिपोर्ट में वोर्टेक्सा के डायरेक्टर क्लेयर जंगमैन ने इस स्थिति पर महत्वपूर्ण जानकारी साझा की है। उन्होंने बताया कि ट्रांसपोंडर बंद करना अब सिर्फ प्रतिबंधों या नाकेबंदी से बचने का एक साधारण जरिया नहीं रह गया है। बल्कि, मौजूदा समय में यह युद्ध के जोखिम, परिचालन संबंधी अनिश्चितताओं और खाड़ी के देशों से कच्चे माल को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए एक व्यापक कमर्शियल सिस्टम (व्यावसायिक रणनीति) बन चुका है। जहाजों द्वारा अपनाई जा रही इस खुफिया तकनीक के कारण अब दुनिया भर की एजेंसियों के लिए रियल टाइम में तेल शिपमेंट और जहाजों के आवागमन को ट्रैक करना लगभग असंभव हो गया है।
ईरानी कॉरिडोर के जरिए एशियाई देशों को सुरक्षित सप्लाई
ईरान और अमेरिका के बीच जारी इस भीषण जंग और पूर्ण नाकेबंदी के बावजूद भारत और चीन जैसे देशों को मिडिल ईस्ट से लगातार कच्चे तेल की खेप मिल रही है। विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि संकट के इस दौर में भारत, चीन और पाकिस्तान जैसे बड़े एशियाई खरीदारों के लिए तेल की अदृश्य सप्लाई लाइनों को सक्रिय किया गया है। इसके लिए मुख्य रूप से ईरान द्वारा प्रस्तावित गुप्त समुद्री रास्तों और विशेष कॉरिडोर का इस्तेमाल किया जा रहा है। चूंकि इन आंतरिक समुद्री मार्गों पर ईरान की सेना और नौसेना का पूरा नियंत्रण है, इसलिए ‘डार्क मोड’ में चल रहे ये व्यापारिक जहाज अमेरिकी रडार की पकड़ में आए बिना पूरी तरह सुरक्षित निकल जाते हैं और खरीदार देशों तक ऊर्जा की सुरक्षित आपूर्ति पहुंच रही है।
