Iran US Peace Talks: पाकिस्तान को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अविश्वास की स्थिति एक बार फिर सामने आई है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित शांति वार्ता से पहले ईरान को पाकिस्तान में हवाई हमले का डर सता रहा था। यही वजह रही कि ईरान ने अपने प्रतिनिधिमंडल की सुरक्षा के लिए इस्लामाबाद रवाना होने के दौरान कई नकली विमान भेजे, जिनमें से केवल एक विमान में ही असली प्रतिनिधिमंडल सवार था।
ईरानी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व मोहम्मद बगेर गालिबफ कर रहे हैं, जो हाल के समय में ईरानी राजनीति में एक प्रमुख चेहरा बनकर उभरे हैं। इस प्रतिनिधिमंडल में ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची भी शामिल हैं।
इस्लामाबाद के लिए रवाना होते समय गालिबफ ने अपने विमान की अगली सीटों को खाली रखा। इन सीटों पर मीनाब स्कूल स्ट्राइक में मारे गए बच्चों की तस्वीरें और उनका सामान—जैसे स्कूल बैग, जूते और कपड़े—रखे गए थे। यह हमला ईरान के मीनाब क्षेत्र में हुआ था, जिसे तेहरान ने अमेरिकी-इजरायली हमला बताया है। इस प्रतीकात्मक कदम के जरिए ईरान ने यह संदेश देने की कोशिश की कि वह वार्ता में अपने उन नागरिकों के दर्द को साथ लेकर जा रहा है, जिन्होंने संघर्ष की कीमत चुकाई है।
दूसरी ओर, अमेरिकी उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस के नेतृत्व में भी एक प्रतिनिधिमंडल पाकिस्तान पहुंच रहा है। इसमें ट्रंप के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और उनके दामाद जेरेड कुशनर शामिल हैं। अमेरिकी टीम के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद, विदेश विभाग और पेंटागन के विशेषज्ञ भी मौजूद हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने 8 अप्रैल की रात ईरान के साथ दो सप्ताह के युद्धविराम की घोषणा की थी। इसके बाद क्षेत्र में स्थायी शांति के प्रयासों के तहत पाकिस्तान में वार्ता प्रस्तावित की गई।
हालांकि, इस वार्ता से पहले क्षेत्रीय हालात तनावपूर्ण बने हुए हैं। लेबनान में इजरायल के हमलों के चलते ईरानी प्रतिनिधिमंडल की यात्रा को लेकर अनिश्चितता बनी रही और सोशल मीडिया पर कई तरह की अटकलें लगाई जाती रहीं। कुछ रिपोर्ट्स में ईरानी मीडिया के हवाले से कहा गया कि प्रतिनिधिमंडल तभी वार्ता में शामिल होगा, जब युद्धविराम की शर्तों का पालन किया जाएगा।
ईरान की अर्ध-सरकारी ‘तसनीम’ समाचार एजेंसी के अनुसार, पहले से तय शर्तें पूरी होने तक बातचीत शुरू नहीं होगी। यह बात गालिबफ के उस बयान से भी मेल खाती है, जिसमें उन्होंने कहा था कि दोनों पक्षों के बीच तय किए गए दो अहम कदम—लेबनान में युद्धविराम और वार्ता से पहले ईरान की संपत्तियों पर लगी रोक हटाना—अभी तक लागू नहीं हुए हैं।
ऐसे में इस्लामाबाद में होने वाली यह वार्ता क्षेत्रीय शांति के लिए अहम मानी जा रही है, लेकिन सुरक्षा और शर्तों को लेकर बनी अनिश्चितता इसे जटिल भी बना रही है।
