पश्चिम एशिया में जारी भीषण सैन्य संघर्ष और अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों पर बढ़ते खतरे के बीच संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने एक बड़ा रणनीतिक कदम उठाया है। यूएई ने अमेरिका और अपने अन्य पश्चिमी सहयोगियों को सूचित किया है कि वह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल गलियारे, होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने के लिए हर संभव सैन्य और कूटनीतिक मदद देने के लिए तैयार है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, यूएई प्रशासन ने इसके लिए तैयारियां भी शुरू कर दी हैं और वह दर्जनों देशों के साथ मिलकर एक “होर्मुज सुरक्षा बल” बनाने की दिशा में काम कर रहा है। इस विशेष बल का मुख्य उद्देश्य ईरानी हमलों से व्यापारिक जहाजों को सुरक्षा प्रदान करना और इस समुद्री रास्ते को फिर से सुचारू बनाना है।
इस पूरे विवाद में यूएई की सक्रियता का एक बड़ा कारण यह भी है कि उसे इस क्षेत्र के किसी भी अन्य देश, यहाँ तक कि इजरायल से भी कहीं अधिक ईरानी हमलों का सामना करना पड़ा है। हालांकि, अमेरिका के कई अन्य करीबी सहयोगियों ने फिलहाल इस मामले में दूरी बना रखी है।
उन्होंने स्पष्ट किया है कि होर्मुज जलडमरूमध्य में अपने युद्धपोत भेजने की उनकी कोई तत्काल योजना नहीं है, जिससे इस अहम जलमार्ग को खुला रखने की राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की अपील को एक तरह से झटका लगा है। इसी कड़ी में फ्रांस ने भी गुरुवार को अपना रुख स्पष्ट करते हुए कहा कि उसने करीब 35 देशों के साथ इस मुद्दे पर बातचीत की है ताकि एक साझा मिशन शुरू किया जा सके, लेकिन फ्रांस का मानना है कि ऐसा तभी संभव होगा जब अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच जारी युद्ध पूरी तरह समाप्त हो जाएगा।
वर्तमान में ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को प्रभावी ढंग से बंद कर रखा है, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गहरा संकट मंडरा रहा है। गौरतलब है कि दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत कच्चा तेल और लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) इसी संकरे रास्ते से होकर गुजरती है। इसके बंद होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में ईंधन की कीमतें आसमान छू रही हैं और पूरी दुनिया में महंगाई बढ़ने का डर पैदा हो गया है। इसी गंभीर स्थिति को देखते हुए यूएई अब बहरीन के साथ मिलकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में एक औपचारिक प्रस्ताव लाने की योजना पर काम कर रहा है।
इस प्रस्ताव के जरिए वे एक ऐसी अंतरराष्ट्रीय टास्कफोर्स के गठन की मांग करेंगे जिसे कानूनी रूप से सैन्य कार्रवाई करने का अधिकार प्राप्त हो। हालांकि, जानकारों का मानना है कि रूस और चीन जैसे देश सुरक्षा परिषद में इस कदम का विरोध कर सकते हैं, जिससे इस संकट का समाधान और अधिक जटिल हो सकता है। फिलहाल, यूएई की इस पहल ने खाड़ी देशों की राजनीति में एक नई हलचल पैदा कर दी है।
