493 करोड़ रुपये के कथित वित्तीय घोटाले और धन शोधन (मनी लॉन्ड्रिंग) मामले में घिरे अल-फलाह यूनिवर्सिटी के चेयरमैन जवाद अहमद सिद्दीकी को दिल्ली की एक अदालत से बहुत बड़ा झटका लगा है। अदालत ने उनकी छह सप्ताह की अंतरिम जमानत याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है। सिद्दीकी ने अपनी पत्नी की तीमारदारी और विशेष देखभाल के आधार पर अंतरिम राहत की गुहार लगाई थी। उनकी पत्नी स्टेज-4 मेटास्टेटिक ओवेरियन कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से पीड़ित हैं और वर्तमान में उनका मेडिकल इलाज चल रहा है।
इस संवेदनशील मामले की सुनवाई दिल्ली की अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश शीतल चौधरी प्रधान की अदालत में संपन्न हुई। अदालत ने अपना फैसला सुनाते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा कि जवाद अहमद सिद्दीकी कानूनी तौर पर यह साबित करने में पूरी तरह असमर्थ रहे हैं कि उनकी पत्नी को इलाज के दौरान केवल उनकी ही विशेष देखभाल की आवश्यकता है या वह अपनी रोजमर्रा की दैनिक जरूरतों को पूरा करने में अक्षम हैं। माननीय न्यायाधीश ने आदेश में उल्लेख किया कि उपलब्ध मेडिकल रिकॉर्ड के मुताबिक, हालांकि आरोपी की पत्नी एक बेहद गंभीर और जानलेवा बीमारी से जूझ रही हैं, परंतु वर्तमान में उनकी स्थिति चिकित्सा दृष्टिकोण से स्थिर बताई गई है। मेडिकल दस्तावेजों में ऐसा कोई भी संकेत या प्रमाण नहीं मिला है जो यह दर्शाता हो कि वह अपनी अंतिम अवस्था में हैं, पूरी तरह बिस्तर पर हैं या अपने नित्य कर्म करने में असमर्थ हैं।
अदालत की टिप्पणी: देखभाल के लिए वयस्क बच्चे और वैकल्पिक व्यवस्था मौजूद
अदालत ने अंतरिम जमानत याचिका को खारिज करने के पीछे एक और महत्वपूर्ण तार्किक आधार यह दिया कि सिद्दीकी यह तथ्य प्रदर्शित करने में भी पूरी तरह विफल रहे हैं कि परिवार में उनकी पत्नी की देखभाल के लिए कोई अन्य वयस्क सदस्य या प्रोफेशनल देखभालकर्ता (केयरटेकर) मौजूद नहीं है। अदालत ने टिप्पणी की कि ऐसे किसी भी आपातकालीन या पारिवारिक संकट के हालात में परिवार के वयस्क बच्चों से यह सामाजिक और नैतिक अपेक्षा की जाती है कि वे आगे बढ़कर अपने माता-पिता की सेवा और देखभाल करें। इसलिए, मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए कानूनी तौर पर यह बिल्कुल नहीं कहा जा सकता कि मरीज की देखरेख के लिए केवल और केवल जेल में बंद मुख्य आरोपी की ही शारीरिक उपस्थिति अनिवार्य है।
क्या है अल-फलाह यूनिवर्सिटी से जुड़ा पूरा घोटाला?
जवाद अहमद सिद्दीकी की मुश्किलें इस साल के शुरुआत से ही लगातार बढ़ी हुई हैं। दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने फरवरी महीने में अल-फलाह यूनिवर्सिटी के भीतर चल रही गंभीर वित्तीय और प्रशासनिक अनियमितताओं व धोखाधड़ी के मामले में उन्हें सबसे पहले गिरफ्तार किया था। इसके बाद, मामले के आर्थिक पहलुओं और मनी लॉन्ड्रिंग के इनपुट को देखते हुए मार्च महीने में केंद्रीय जांच एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने उन्हें अपनी आधिकारिक हिरासत में ले लिया था।
प्रवर्तन निदेशालय की जांच रिपोर्ट के अनुसार, अल-फलाह यूनिवर्सिटी के प्रबंधन ने कथित तौर पर हजारों छात्रों और उनके अभिभावकों को झांसा देने के लिए ‘एनएएसी’ (NAAC) ग्रेडिंग और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) की फर्जी व भ्रामक मान्यताओं से जुड़े झूठे दावे किए थे। जांच एजेंसी का गंभीर आरोप है कि इन फर्जी दावों के जाल में फंसाकर छात्रों से फीस के माध्यम से लगभग 493.24 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि अवैध आय (प्रोसीड्स ऑफ क्राइम) के रूप में वसूली गई। ईडी की तफ्तीश में यह भी सामने आया है कि चेयरमैन सिद्दीकी ने अल-फलाह चैरिटेबल ट्रस्ट के इस जनहित फंड को अवैध तरीके से अपने व्यक्तिगत बैंक खातों और विभिन्न निजी निवेश माध्यमों में स्थानांतरित (रूट) किया था। इस काले धन को पूरी तरह सफेद (धन शोधन) करने के लिए कई मुखौटा संस्थाओं, शेल कंपनियों और जटिल वित्तीय माध्यमों का सुनियोजित इस्तेमाल किया गया था।
लाल किला ब्लास्ट के आरोपी से भी जुड़े थे तार
गौरतलब है कि अल-फलाह यूनिवर्सिटी का नाम हाल के दिनों में एक और बेहद संवेदनशील और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामले को लेकर चर्चा के केंद्र में आया था। नवंबर 2025 में सुरक्षा एजेंसियों की जांच के दौरान यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ था कि दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किला विस्फोट मामले का मुख्य आरोपी डॉक्टर उमर नबी इसी अल-फलाह संस्थान में लंबे समय तक कार्यरत रहा था। बता दें कि उस भीषण लाल किला बम धमाके में कुल 12 मासूम लोगों की जान चली गई थी।
अदालत ने अपने अंतिम आदेश में देश की सुरक्षा, वैकल्पिक व्यवस्था की उपलब्धता और अपराध की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए स्पष्ट किया कि आरोपी अंतरिम जमानत पाने के लिए कोई भी ठोस, पर्याप्त और संतोषजनक कानूनी आधार पेश करने में पूरी तरह नाकाम रहे हैं। इसी टिप्पणी के साथ कोर्ट ने उनकी छह हफ्ते की अंतरिम रिहाई की अर्जी को निरस्त कर दिया। फिलहाल, प्रवर्तन निदेशालय (ED) 493 करोड़ रुपये के इस महाघोटाले के अन्य सुरागों को खंगालने में जुटी हुई है और जवाद अहमद सिद्दीकी सलाखों के पीछे न्यायिक प्रक्रिया का सामना कर रहे हैं।
