कॉर्क, आयरलैंड: एयर इंडिया की उड़ान 182, जिसे कनिष्क बम विस्फोट के नाम से जाना जाता है, की 40वीं बरसी पर आज आयरलैंड के कॉर्क में अहाकिस्ता स्मारक पर एक भावुक समारोह आयोजित किया गया। इस मौके पर भारत के केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने अन्य गणमान्य व्यक्तियों के साथ पुष्पांजलि अर्पित कर 329 निर्दोष पीड़ितों को श्रद्धांजलि दी।
23 जून 1985 को, कनाडा स्थित खालिस्तानी आतंकवादी समूह बब्बर खालसा ने एयर इंडिया की इस उड़ान को आयरलैंड के कॉर्क के पास हवा में उड़ा दिया था, जिसमें सवार सभी 329 यात्रियों की जान चली गई थी।
आतंकवाद आज भी बड़ा खतरा: हरदीप पुरी
इस जघन्य कृत्य की 40वीं वर्षगांठ पर बोलते हुए, केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने आतंकवाद के बढ़ते खतरे पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, “आतंकवाद और उग्रवाद आज भी एक बहुत बड़ा खतरा बना हुआ है, जिसे हमारे कई देश बहुत अच्छी तरह जानते हैं। अक्सर यह बात भुला दी जाती है कि आतंकवादी सबसे बुनियादी अधिकार, जीवन के अधिकार को छीन लेते हैं। चाहे यह कृत्य 9/11, 26/11 या पहलगाम में किया गया हो, प्रभाव बिल्कुल एक जैसे ही होते हैं।”
पुरी ने 1985 में हुए इस हमले को “अमानवीय, क्रूर और बुजदिल” बताते हुए कहा कि उन्होंने भारतवासियों की ओर से पीड़ितों को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने यह भी बताया कि 2019 में उन्होंने टोरंटो के हंबर पार्क स्थित कनिष्क मेमोरियल पर भी श्रद्धांजलि अर्पित की थी और उन परिवारों के दुख साझा किए थे जिन्होंने इस हमले में अपनों को खोया था।
आतंकवाद के खिलाफ एकजुट लड़ाई का आह्वान:
केंद्रीय मंत्री ने आतंकवाद के विरुद्ध भारत की लड़ाई को मजबूती से जारी रखने का संकल्प दोहराया। उन्होंने कहा, “विचारधाराएं अलग-अलग हो सकती हैं, राजनीतिक मतभेद भी हो सकते हैं लेकिन हमें आतंकवाद से सतर्क रहने और उसके विरुद्ध सामूहिकता की जरूरत है।”
पुरी ने आज के कार्यक्रम में आयरलैंड के प्रधानमंत्री माइकल मार्टिन, कनाडा के मंत्री गैरी एसआरपी के साथ भारतीय दल के वरिष्ठ नेता तरुण चुग, सरदार नरिंदर रैना, सरदार अरविंदर लवली, सरदार बलदेव औलख, सरदार गुरवीर बरार और सरदार त्रिलोक सिंह चीमा सहित अनेक गणमान्य स्थानीय लोगों की उपस्थिति का भी उल्लेख किया।
उन्होंने जोर दिया कि अब “इस प्रकार की आतंकवादी और अलगाववादी सोच के फंडिंग चैनलों को बंद करके कट्टरपंथ को रोकने की आवश्यकता है ताकि, उग्रवाद इस धरती पे न पनप पाए।” पुरी ने अपने संबोधन का समापन इस संकल्प के साथ किया कि हमें अपने प्रयासों को दोगुना करना होगा ताकि 23 जून 1985 को जो हुआ, वह दुनिया में कहीं भी, कभी भी दोहराया न जाए।
