नई दिल्ली। वैश्विक ऊर्जा बाजार में तेजी से बदलते हालात के बीच रूस और भारत के बीच ऊर्जा क्षेत्र में एक नया समीकरण उभरता दिखाई दे रहा है। जिस रूस से भारत अपनी जरूरत का करीब 40 प्रतिशत कच्चा तेल (क्रूड ऑयल) आयात करता रहा है, अब वही देश पेट्रोल और गैसोलीन की आपूर्ति के लिए भारत की रिफाइनिंग क्षमता पर भरोसा जता रहा है। इस बदलाव के पीछे रूस-यूक्रेन युद्ध, रिफाइनरियों पर हुए हमले और भारत की मजबूत रिफाइनिंग क्षमता अहम वजह मानी जा रही है।
ड्रोन हमलों से रूस की रिफाइनरियां प्रभावित
पिछले ढाई वर्षों से जारी रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान यूक्रेन ने अपनी रणनीति में बदलाव करते हुए रूस की तेल रिफाइनरियों को निशाना बनाना शुरू किया। हाल के हफ्तों में मॉस्को की प्रमुख ऑयल रिफाइनरी समेत तानेको, रियाजान और क्रास्नोदार जैसी कई महत्वपूर्ण रिफाइनरियों पर ड्रोन हमले हुए।
इन हमलों के बाद रूस के पेट्रोल उत्पादन में करीब 25 प्रतिशत की गिरावट आने की बात कही जा रही है। इसके चलते देश में पेट्रोल और गैसोलीन की उपलब्धता प्रभावित हुई और ईंधन की कमी बढ़ने लगी। हालात को देखते हुए रूस को घरेलू जरूरतों को प्राथमिकता देते हुए डीजल निर्यात पर भी रोक लगानी पड़ी।
भारत की ओर क्यों देख रहा है रूस?
हालांकि भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है, लेकिन रिफाइनिंग क्षमता के मामले में वह दुनिया के प्रमुख देशों में शामिल है। भारत की आधुनिक रिफाइनरियां विभिन्न ग्रेड के कच्चे तेल को प्रोसेस कर उच्च गुणवत्ता वाले पेट्रोल, डीजल और अन्य पेट्रोलियम उत्पाद तैयार करने में सक्षम हैं।
इसी क्षमता को देखते हुए रूस एक ऐसी व्यवस्था पर काम कर रहा है, जिसके तहत वह अपना कच्चा तेल भारत भेजेगा। भारत की रिफाइनरियां इस तेल को प्रोसेस कर पेट्रोल और गैसोलीन तैयार करेंगी और फिर तैयार ईंधन वापस रूस भेजा जाएगा। इसके लिए रूस अपने टैक्स नियमों में संशोधन कर भारत से आने वाले रिफाइंड ईंधन पर कर राहत और सब्सिडी देने की तैयारी कर रहा है।
भारत को क्या होगा फायदा?
यदि यह व्यवस्था लागू होती है तो भारत को कई स्तरों पर लाभ मिल सकता है। सबसे पहले, भारत का रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात बढ़ेगा, जिससे रूस के साथ व्यापार संतुलन बेहतर हो सकता है।
इसके अलावा, यह भारत की वैश्विक रिफाइनिंग क्षमता और औद्योगिक दक्षता को भी मजबूत पहचान देगा। भारत पहले से ही ऐसी रिफाइनिंग सुविधाओं से लैस है, जहां विभिन्न प्रकार के कच्चे तेल को उच्च गुणवत्ता वाले ईंधन में बदला जा सकता है।
चुनौतियां भी रहेंगी
हालांकि यदि रूस में ईंधन संकट और गहराता है तो इसका असर वैश्विक तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों पर पड़ सकता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में बढ़ोतरी का प्रभाव भारत के घरेलू बाजार पर भी देखने को मिल सकता है।
फिर भी रणनीतिक दृष्टि से इस पूरे घटनाक्रम को भारत के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह संकेत देता है कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला में भारत की भूमिका लगातार मजबूत हो रही है और वह केवल एक बड़े उपभोक्ता बाजार के बजाय रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति करने वाले प्रमुख देशों में अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है।
