Super El Nino Alert 2026: जलवायु परिवर्तन की मार झेल रही धरती पर अब एक नया और बेहद गंभीर संकट मंडरा रहा है। संयुक्त राष्ट्र के विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने चेतावनी जारी की है कि अगले कुछ हफ्तों में ‘अल नीनो’ का एक नया और खतरनाक दौर शुरू हो सकता है।
मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, साल 2026 के बाकी महीनों में इसके और मजबूत होने की आशंका है, जिससे यह अब तक का सबसे विनाशकारी ‘सुपर अल नीनो’ साबित हो सकता है। कई देशों की मौसम एजेंसियों के अनुमान बताते हैं कि यह अब तक का सबसे मजबूत अल नीनो हो सकता है, जिसे विशेषज्ञ ‘सुपर अल नीनो’ का नाम दे रहे हैं।
अल नीनो असल में समुद्र के भीतर होने वाली एक ऐसी हलचल है, जिसमें प्रशांत महासागर का पानी असामान्य रूप से गर्म हो जाता है। इसकी वजह से पूरी दुनिया का मौसम चक्र बिगड़ जाता है, हवाएं कमजोर हो जाती हैं और दुनिया भर के तापमान में बढ़ोतरी होती है।
संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने भी आगाह किया है कि अल नीनो की यह स्थिति पहले से ही गर्म हो रही दुनिया की आग में घी डालने का काम करेगी और इसके प्रभाव बहुत विनाशकारी होंगे। आमतौर पर अल नीनो वाले साल में दुनिया का तापमान लगभग 0.2 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाता है। इस स्थिति को देखते हुए जलवायु वैज्ञानिकों का मानना है कि साल 2027 के अब तक का सबसे गर्म साल होने के पूरे आसार हैं।
इस मौसमी बदलाव का भारत सहित दुनिया के कई हिस्सों पर गंभीर असर पड़ेगा। यह भारतीय मॉनसून को कमजोर कर सकता है, जिससे देश में भयंकर सूखे और भीषण गर्मी का खतरा बढ़ जाएगा। इसके अलावा अफ्रीका, दक्षिण-पूर्वी एशिया और ऑस्ट्रेलिया के कुछ हिस्सों में मौसम बेहद गर्म और सूखा हो जाएगा, जिससे वहाँ जंगलों में आग लगने की आशंका बढ़ जाएगी।
इसके विपरीत, दक्षिण अमेरिका जैसे इलाकों में भारी बारिश के कारण बाढ़ का खतरा पैदा हो जाएगा। इतिहास गवाह है कि अल नीनो के कारण बड़े पैमाने पर फसलों की बर्बादी होती है, जिससे दुनिया भर में खाने-पीने की चीज़ें महंगी हो जाती हैं और अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचता है।
अल नीनो के आने के सटीक समय और उसके प्रभाव का अंदाजा लगाना हमेशा से चुनौतीपूर्ण रहा है, इसलिए वैज्ञानिक प्रशांत महासागर के मध्य हिस्से पर लगातार नजर रख रहे हैं। दिसंबर के महीने में जहां इस क्षेत्र का पानी औसत से ठंडा था और अल नीनो का कोई नामोनिशान नहीं था, वहीं मार्च आते-आते स्थिति पूरी तरह बदल गई। मध्य प्रशांत महासागर का पानी गर्म होने लगा और दक्षिण अमेरिका के तट के पास बहुत गर्म पानी देखा गया।
अप्रैल तक अल नीनो का खतरा बिल्कुल साफ हो गया, क्योंकि मुख्य निगरानी क्षेत्र का तापमान तेजी से बढ़ रहा था। असल में अल नीनो तब बनता है, जब हवा के रुख में बदलाव के कारण गर्म पानी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर में फैल जाता है। यदि प्रशांत महासागर के इस क्षेत्र का तापमान लंबे समय तक सामान्य से दो डिग्री सेल्सियस से ज्यादा बढ़ जाता है, तो उसे ‘सुपर अल नीनो’ कहा जाता है।
साल 1950 के बाद से ऐसे केवल कुछ ही मामले सामने आए हैं, लेकिन इस बार के पूर्वानुमान बताते हैं कि यह नया अल नीनो पुराने सभी रिकॉर्ड तोड़ सकता है। सेटेलाइट और महासागरीय उपकरणों के मुताबिक, समुद्र की सतह से सैकड़ों मीटर नीचे गर्म पानी की एक बहुत बड़ी लहर पूर्व की ओर बढ़ रही है।
समुद्र के भीतर की यह गर्मी अक्सर सतह के पानी को गर्म करने का संकेत होती है, जो बाद में ऊपर की हवा को गर्म करती है और दुनिया भर के मौसम को बिगाड़ देती है। वैसे तो कोई भी दो अल नीनो एक जैसे नहीं होते और अलग-अलग देशों पर इसका असर अलग-अलग समय पर पड़ता है, लेकिन एक मजबूत अल नीनो के सामान्य प्रभाव काफी खतरनाक साबित होते हैं।
