गुवाहाटी: असम विधानसभा चुनाव 2026 के ऐतिहासिक नतीजों के बाद राज्य की सियासत में जुबानी जंग तेज हो गई है। मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने कांग्रेस की करारी हार पर तीखा हमला करते हुए राज्य के विधायी प्रतिनिधित्व के स्वरूप पर सवाल उठाए हैं। सरमा ने दावा किया कि इस बार कांग्रेस के टिकट पर जितने भी उम्मीदवार जीतकर विधानसभा पहुंचे हैं, उनमें से केवल एक ही हिंदू है और बाकी सभी मुस्लिम समुदाय से हैं।
मुख्यमंत्री ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि कांग्रेस अब असम में एक समावेशी पार्टी के बजाय केवल एक विशेष समुदाय की प्रतिनिधि बनकर रह गई है। उन्होंने कांग्रेस के इस प्रदर्शन को राज्य में उसके घटते जनाधार और ध्रुवीकरण की राजनीति का परिणाम बताया। सरमा का यह बयान उस समय आया है जब बीजेपी ने अपने दम पर 82 सीटें जीतकर राज्य में पहली बार पूर्ण बहुमत हासिल किया है, जबकि कांग्रेस गठबंधन महज 21 सीटों पर सिमट गया है।
बदरुद्दीन अजमल का कांग्रेस पर तीखा प्रहार
दूसरी तरफ, एआईयूडीएफ (AIUDF) के प्रमुख बदरुद्दीन अजमल ने भी कांग्रेस को आड़े हाथों लिया। अजमल ने कांग्रेस की तुलना ‘मुस्लिम लीग’ से करते हुए कहा कि जो दूसरों के लिए गड्ढा खोदता है, वह खुद उसमें गिरता है। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने इस चुनाव में एआईयूडीएफ को खत्म करने की साजिश रची थी, लेकिन अंततः वह खुद ही चुनावी मैदान से बाहर हो गई। अजमल ने कटाक्ष करते हुए कहा, “हमें दुख है कि कांग्रेस अब पूरी तरह ‘मुस्लिम लीग’ में तब्दील हो गई है। उनके सभी प्रमुख चेहरे हार गए हैं।”
असम की सियासत में नए समीकरण
चुनाव नतीजों के बाद आए इन बयानों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि असम में विपक्षी खेमे के बीच की दरार अब और चौड़ी हो गई है। कांग्रेस के लिए यह स्थिति न केवल चुनावी हार है, बल्कि उसकी सांगठनिक पहचान के लिए भी एक बड़ा संकट है। मुख्यमंत्री के दावों और अजमल के हमलों ने कांग्रेस को रक्षात्मक मुद्रा में ला खड़ा किया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन नतीजों के बाद राज्य में राजनीतिक ध्रुवीकरण और गहरा सकता है, जिससे भविष्य में कांग्रेस के लिए अपनी पुरानी पैठ वापस पाना और भी चुनौतीपूर्ण हो जाएगा।
इस बीच, कांग्रेस के भीतर भी हार का मंथन शुरू हो गया है, जहां असम के चुनाव प्रभारी भंवर जितेंद्र सिंह ने अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए पद से इस्तीफा दे दिया है।
