ईरान के खिलाफ जारी सैन्य और कूटनीतिक गतिरोध के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक सनसनीखेज दावा किया है। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लिखा कि अमेरिकी नाकेबंदी और हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) पर बढ़ते दबाव के कारण ईरान की अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है। ट्रंप के अनुसार, स्थिति यहाँ तक पहुँच गई है कि ईरान अपने सुरक्षा बलों और पुलिस तक को सैलरी देने में असमर्थ साबित हो रहा है, जिससे वहाँ के सैन्य महकमे में भारी नाराजगी और असंतोष का माहौल है।
राष्ट्रपति ट्रंप ने आंकड़ों का हवाला देते हुए दावा किया कि ईरान को इस समय हर दिन करीब 500 मिलियन डॉलर (लगभग 4200 करोड़ रुपये) का भारी नुकसान हो रहा है। उन्होंने कहा कि समुद्री ब्लॉकेड की वजह से ईरान की कमाई का मुख्य जरिया तेल निर्यात लगभग रुक गया है। हालांकि ट्रंप ने इन दावों के समर्थन में कोई पुख्ता सबूत या दस्तावेज़ पेश नहीं किए हैं, लेकिन उनके इस बयान को ईरान पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। अमेरिकी ट्रेजरी विभाग के अधिकारियों ने भी इसकी पुष्टि की है कि ईरान के बंदरगाहों की घेराबंदी सीधे उसकी ‘आर्थिक जीवन रेखा’ को निशाना बना रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका की नजर विशेष रूप से ईरान के खार्ग आईलैंड पर है, जिसे ईरानी तेल उद्योग का हृदय स्थल कहा जाता है। ईरान का लगभग 90 प्रतिशत तेल निर्यात इसी द्वीप के जरिए होता है। यदि यहाँ स्टोरेज पूरी तरह भर जाता है और सप्लाई रुकी रहती है, तो ईरान की आय शून्य हो जाएगी। अमेरिका ने चेतावनी दी है कि वह किसी भी देश, कंपनी या व्यक्ति पर कड़ी कार्रवाई करेगा जो ईरान को तेल व्यापार या किसी अन्य तरीके से आर्थिक मदद पहुँचाने की कोशिश करेगा। इसी कड़ी में हाल ही में तेल सप्लाई से जुड़ी कई कंपनियों और व्यक्तियों पर नए प्रतिबंध भी लगाए गए हैं।
इस आर्थिक युद्ध के बीच एक बड़ा कूटनीतिक मोड़ तब आया जब राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान के साथ जारी सीजफायर को कुछ और समय के लिए बढ़ाने का फैसला लिया। यह फैसला इसलिए भी चौंकाने वाला है क्योंकि ट्रंप बार-बार कह रहे थे कि सीजफायर की अवधि अब और नहीं बढ़ाई जाएगी। रिपोर्ट्स की मानें तो पाकिस्तान की मध्यस्थता में चल रही बातचीत को सफल बनाने के लिए यह अतिरिक्त समय दिया गया है। ऐसा माना जा रहा है कि ईरान के भीतर सत्ता के अलग-अलग धड़ों में बातचीत को लेकर मतभेद हैं और उन्हें एक संयुक्त प्रस्ताव तैयार करने के लिए मोहलत चाहिए।
इधर अमेरिका के भीतर भी ट्रंप प्रशासन युद्ध के कारण बढ़ने वाली तेल की कीमतों को लेकर सतर्क है। खबर है कि प्रशासन ‘जोन्स एक्ट’ (Jones Act) में ढील देने पर विचार कर रहा है, ताकि विदेशी जहाजों के जरिए ईंधन की सप्लाई बढ़ाकर घरेलू बाजार में बढ़ती कीमतों को नियंत्रित किया जा सके। अब पूरी दुनिया की नजरें ईरान के अगले कदम पर टिकी हैं कि क्या वह इस भीषण आर्थिक और सैन्य दबाव के आगे घुटने टेक कर बातचीत की मेज पर आता है, या फिर यह तनाव किसी बड़े क्षेत्रीय टकराव में तब्दील हो जाएगा।
