UCC पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी: ‘अब वक्त आ गया है’, मुस्लिम महिलाओं के उत्तराधिकार पर सुनवाई के दौरान बेंच का अहम सुझाव

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत महिलाओं के अधिकारों के कथित उल्लंघन को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए देश में ‘समान नागरिक संहिता’ (UCC) लागू करने की वकालत की।

Supreme Court of India
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नई दिल्ली: देश में ‘समान नागरिक संहिता’ (UCC) को लेकर चल रही लंबी बहस के बीच आज भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण रुख अपनाया है। मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत महिलाओं के अधिकारों के कथित उल्लंघन को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से देश में समान नागरिक संहिता लागू करने की वकालत की। कोर्ट ने कहा कि देश की सभी महिलाओं के लिए समान अधिकार सुनिश्चित करने का सबसे प्रभावी और एकमात्र तरीका पूरे देश में यूसीसी को लागू करना ही है।

विधायिका के विवेक पर छोड़ा फैसला

मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस आर. महादेवन की तीन सदस्यीय बेंच ने इस संवेदनशील मुद्दे पर विचार-विमर्श किया। सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने एक महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु रेखांकित करते हुए कहा कि केवल पर्सनल लॉ को अमान्य घोषित कर देने से कानूनी शून्यता (Vacuum) की स्थिति पैदा हो जाएगी। इससे बेहतर यह होगा कि इस विषय को ‘विधायी विवेक’ पर छोड़ दिया जाए ताकि संसद एक व्यापक और सर्वसमावेशी समान नागरिक संहिता कानून बना सके। बेंच ने सुझाव दिया कि विधायिका को पर्सनल लॉ के कारण उत्पन्न होने वाली कानूनी पेचीदगियों और विसंगतियों को दूर करने के लिए सक्रियता से काम करना चाहिए।

द्विविवाह और मौलिक कर्तव्यों पर टिप्पणी

अदालत ने व्यक्तिगत कानूनों पर आधारित द्विविवाह (Bigamy) जैसे संबंधों की वैधता पर भी सवाल उठाए। बेंच ने टिप्पणी की कि मौलिक कर्तव्यों को प्रभावी बनाने और सामाजिक समानता सुनिश्चित करने के लिए अंततः विधायिका पर ही निर्भर रहना होगा। सीजेआई सूर्यकांत ने इस बात पर जोर दिया कि इन तमाम विसंगतियों का ठोस उत्तर ‘समान नागरिक संहिता’ ही है। कोर्ट की इस टिप्पणी को कानूनी गलियारों में एक बड़े संकेत के रूप में देखा जा रहा है, जो भविष्य में सरकार के नीतिगत फैसलों को प्रभावित कर सकता है।

प्रशांत भूषण को याचिका में संशोधन के निर्देश

मुस्लिम महिलाओं को उत्तराधिकार के समान अधिकार न मिलने के मुद्दे पर दायर इस याचिका में ‘मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरिया) एप्लीकेशन एक्ट, 1937’ को चुनौती दी गई है। सुनवाई के दौरान सीजेआई ने याचिकाकर्ता के वकील प्रशांत भूषण को अपनी याचिका में संशोधन करने और वैकल्पिक प्रावधानों पर विचार करने का निर्देश दिया। वकील भूषण ने अदालत की बात से सहमति जताते हुए याचिका में सुधार करने की बात कही। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई को स्थगित कर दिया और याचिकाकर्ता को संशोधित याचिका दाखिल करने की अनुमति प्रदान की।

देश के वर्तमान राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी अत्यंत प्रभावशाली मानी जा रही है। अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि केंद्र सरकार और संसद इस दिशा में आगे क्या कदम उठाती है।

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