पश्चिम एशिया (मिडल ईस्ट) लंबे समय से भीषण उथल-पुथल और तनाव के दौर से गुजर रहा है। ईरान, लेबनान, सीरिया और यमन समेत क्षेत्र के कई इलाकों में पहले से ही सैन्य संघर्ष चल रहे हैं। इस सब के बीच, इस अशांत क्षेत्र में एक और विनाशकारी लड़ाई छिड़ने की गंभीर चेतावनी रक्षा विशेषज्ञों द्वारा दी गई है। यह संभावित लड़ाई तुर्की और इजरायल के बीच हो सकती है। अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का दावा है कि तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन द्वारा अपनी सेना को लगातार आधुनिक और अत्यधिक शक्तिशाली बनाने की कोशिशों के पीछे असल मकसद इजरायल के खिलाफ खुद को रणनीतिक रूप से मजबूत करना है।
यरूशलम पोस्ट की एक विशेष रिपोर्ट के मुताबिक, तुर्की के निर्वासित वरिष्ठ पत्रकार और खोजी वेबसाइट ‘नॉर्डिक मॉनिटर’ के संस्थापक अब्दुल्ला बोजकुर्ट ने एक चौंकाने वाला दावा किया है। बोजकुर्ट का कहना है कि रेसेप तैयप एर्दोगन की सरकार हाल के दिनों में लगातार ऐसे कदम उठा रही है, जिनसे यह साफ पता चलता है कि वे एक बड़े और संभावित युद्ध की स्थिति के लिए खुद को तैयार कर रहे हैं। इस पूरी सैन्य तैयारी में इजरायल तुर्की के लिए एक संभावित मुख्य लक्ष्य (टारगेट) के रूप में उभरकर सामने आ रहा है।
अब्दुल्ला बोजकुर्ट के विश्लेषण के अनुसार, हालांकि अंकारा (तुर्की सरकार) ने अभी तक आधिकारिक तौर पर इजरायल को अपना दुश्मन देश घोषित नहीं किया है, लेकिन अंदरूनी तौर पर इसकी पूरी जमीन तैयार की जा रही है। उन्होंने तर्क दिया कि तुर्की के आंतरिक नियमों में किए गए हालिया बदलाव, राष्ट्रपति की आपातकालीन शक्तियों में अप्रत्याशित बढ़ोतरी, लंबी दूरी की मिसाइलों और आधुनिक ड्रोनों के विकास में आई तेजी तथा तुर्की के शीर्ष अधिकारियों की लगातार तीखी इजरायल विरोधी बयानबाजी इसी ओर स्पष्ट इशारा करती हैं। इन सब गतिविधियों के जरिए तुर्की की जनता के सामने इजरायल को देश के लिए एक बहुत बड़े सुरक्षा खतरे के तौर पर पेश किया जा रहा है।
बोजकुर्ट का कहना है कि एर्दोगन सरकार द्वारा उठाए गए सबसे महत्वपूर्ण कदमों में एक अहम नियम मई 2024 में लागू किया गया था। इस नए नियम ने युद्ध या राष्ट्रीय संकट की स्थिति में देश के सभी प्राकृतिक संसाधनों, निजी कंपनियों, परिवहन साधनों और विशेष तकनीकी कौशल रखने वाले नागरिकों को सीधे सरकार के नियंत्रण में जुटाने के अधिकार को अत्यधिक बढ़ा दिया है। ये नए नियम तुर्की प्रशासन को बिना किसी औपचारिक युद्ध की घोषणा के भी बेहद तेजी से और अचानक आपातकालीन स्थिति (इमरजेंसी) में आने की कानूनी अनुमति देते हैं। इसके साथ ही, साल 2016 में तुर्की में हुई तख्तापलट की नाकाम कोशिश के बाद से राष्ट्रपति एर्दोगन ने तुर्की के सैन्य नेतृत्व और खुफिया तंत्र में बड़े पैमाने पर फेरबदल किए हैं। इन नीतिगत बदलावों ने देश के पूरे सुरक्षा तंत्र पर एर्दोगन की व्यक्तिगत पकड़ को बेहद मजबूत कर दिया है, जिसके तुरंत बाद से ही उन्होंने इजरायल के खिलाफ अपना रुख और ज्यादा कड़ा व आक्रामक कर लिया है।
अब्दुल्ला बोजकुर्ट के जमीनी आकलन के मुताबिक, अगर राष्ट्रपति एर्दोगन भविष्य में इजरायल के साथ सीधे सैन्य टकराव की ओर आगे बढ़ते हैं, तो इस महायुद्ध की सबसे संभावित जगह सीरिया की धरती होगी। सीरिया में इस समय तुर्की और इजरायल दोनों की सेनाएं एक-दूसरे के प्रभाव वाले क्षेत्रों के बेहद करीब रहकर काम करती हैं और वहां दोनों देशों के रणनीतिक हित आपस में सीधे टकराते हैं। यह भू-राजनीतिक टकराव किसी भी समय एक बड़े और सीधे सैन्य संघर्ष में तब्दील हो सकता है। हालांकि, बोजकुर्ट ने यह भी साफ किया कि उनके पास युद्ध शुरू करने के तुर्की के किसी निश्चित फैसले का कोई लिखित या प्रत्यक्ष सबूत नहीं है, लेकिन उन्हें ऐसे कई मजबूत संकेत और साक्ष्य मिले हैं जो अंकारा की सुरक्षा नीति में आए इस खतरनाक और रणनीतिक बदलाव की पुष्टि करते हैं। गौरतलब है कि अब्दुल्ला बोजकुर्ट तुर्की से निर्वासित पत्रकार हैं और उन्हें राष्ट्रपति एर्दोगन के धुर विरोधियों में गिना जाता है।
दूसरी तरफ, इस पूरे घटनाक्रम पर इजरायल के रक्षा विशेषज्ञों ने भी अपनी प्रतिक्रिया दी है। तुर्की मामलों के एक इजरायली विशेषज्ञ ने इजरायली मीडिया आउटलेट ‘Ynet’ से बातचीत में कहा कि राष्ट्रपति एर्दोगन के इन बड़े और कड़े फैसलों का प्राथमिक मकसद तुर्की सेना पर अपना पूर्ण नियंत्रण स्थापित करना था, ताकि भविष्य में तख्तापलट की किसी भी दूसरी कोशिश को पहले ही नाकाम किया जा सके। सेना पर इस कड़े नियंत्रण के जरिए उसकी हर छोटी-बड़ी गतिविधि पर सरकार की सीधी नजर रहेगी। हालांकि, इजरायली विशेषज्ञ ने यह भी माना कि अगर इन सभी घटनाओं को पत्रकार बोजकुर्ट के व्यापक और खोजी नजरिए से देखा जाए, तो यह निश्चित ही संकेत देता है कि भविष्य में दोनों देशों के बीच कुछ बहुत चिंताजनक और खतरनाक घटित होने वाला है।
