इतिहास को नजरअंदाज करते हुए वर्तमान कभी-कभी ऐसे दृश्य रचता है, जिन पर यकीन करना मुश्किल हो जाता है। जिस इराक के साथ ईरान ने आठ साल तक खूनी युद्ध लड़ा, अब उसी इराक की धरती पर ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के शव को ले जाने की चर्चा सुर्खियों में है।
1980 से 1988 तक चला ईरान-इराक युद्ध पश्चिम एशिया के इतिहास के सबसे विनाशकारी संघर्षों में गिना जाता है। 1980 में इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन ने ईरान पर हमला किया था। इसकी सबसे बड़ी वजह 1979 की ईरानी क्रांति बताई गई, जिससे सद्दाम हुसैन को आशंका थी कि उसकी विचारधारा इराक के शिया बहुल इलाकों तक फैल सकती है। इसके अलावा शत्त-अल-अरब जलमार्ग और सीमा विवाद भी दोनों देशों के बीच लंबे समय से तनाव का कारण थे।
उस समय ईरान की सर्वोच्च सत्ता रुहोल्लाह खामेनेई के हाथ में थी। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद वे ईरान के पहले सुप्रीम लीडर बने थे और देश की सेना, विदेश नीति तथा सरकार से जुड़े अंतिम निर्णय लेने का अधिकार उनके पास था। वहीं, ईरान के पहले निर्वाचित राष्ट्रपति अब्दुल हसन ने फरवरी 1980 में पद संभाला था और शुरुआती दौर में सेना के कमांडर-इन-चीफ भी रहे। हालांकि 1981 में उनके और खामेनेई के बीच मतभेद बढ़ गए, जिसके बाद उन्हें पद से हटा दिया गया और वे फ्रांस निर्वासित चले गए।
आठ वर्षों तक चले युद्ध में दोनों देशों के सैनिक लगातार मोर्चों पर लड़ते रहे। इस दौरान रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल के आरोप लगे, कई शहर तबाह हुए और लगभग दस लाख लोगों की जान गई। युद्ध समाप्त होने के बावजूद दोनों देशों के बीच अविश्वास और दुश्मनी की गहरी खाई बनी रही। हालांकि चार दशक बाद हालात बदल चुके हैं। सद्दाम हुसैन का शासन समाप्त हो चुका है और इराक की राजनीति में ईरान का प्रभाव पहले से अधिक मजबूत माना जाता है।
मंगलवार, 7 जुलाई को खामेनेई के शव को अंतिम संस्कार से जुड़ी रस्मों के लिए ईरान के धार्मिक शहर कोम ले जाया जाएगा। इसके बाद बुधवार, 8 जुलाई को इराक के पवित्र शहरों नजफ और कर्बला में रस्में आयोजित होंगी, जिनमें ईरान के क्षेत्रीय शिया प्रॉक्सी नेटवर्क के प्रमुख लोगों के शामिल होने की बात कही गई है। गुरुवार को एक और जुलूस के बाद उन्हें ईरान के मशहद शहर में इमाम रजा के मकबरे के पास दफनाया जाएगा।
नजफ और कर्बला तक शव ले जाने को धार्मिक और राजनीतिक दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। बगदाद से लेकर नजफ और कर्बला तक ईरान समर्थक शिया संगठनों और राजनीतिक दलों की मजबूत मौजूदगी बताई जाती है। इसी वजह से इराक को ईरान के धार्मिक और रणनीतिक प्रभाव क्षेत्र का अहम हिस्सा माना जाता है।
नजफ और कर्बला दुनिया भर के शिया मुसलमानों के प्रमुख आस्था केंद्र हैं। इन पवित्र शहरों में शव ले जाना इस बात का संकेत माना जाता है कि संबंधित शख्सियत को शिया इतिहास, शहादत और इमामों की विरासत से जोड़ा जा रहा है। इससे अंतिम संस्कार केवल एक निजी या राष्ट्रीय रस्म नहीं रह जाता, बल्कि व्यापक शिया धार्मिक अनुष्ठान का रूप ले लेता है। साथ ही इसे ईरान की शिया दुनिया में नेतृत्व की भूमिका और खामेनेई की विरासत को पूरे शिया समुदाय से जोड़ने वाले संदेश के रूप में भी देखा जा रहा है।
यह घटनाक्रम केवल एक शव यात्रा की कहानी नहीं, बल्कि पश्चिम एशिया की बदलती राजनीति, बदलते समीकरणों और इतिहास के अप्रत्याशित मोड़ों की भी एक तस्वीर पेश करता है, जहां कभी युद्ध का मैदान रहे ईरान और इराक के रिश्तों में अब धार्मिक जुड़ाव और राजनीतिक हितों का नया अध्याय दिखाई देता है।
