नई दिल्ली: भारत 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी के लिए तैयार है। 12 और 13 सितंबर 2026 को नई दिल्ली स्थित भारत मंडपम में होने वाले इस सम्मेलन में ब्रिक्स सदस्य और पार्टनर देशों के शीर्ष नेता हिस्सा लेंगे। आउटरीच कार्यक्रम के तहत कुछ अन्य देशों के नेताओं के भी सम्मेलन में शामिल होने की उम्मीद है।
इस वर्ष ब्रिक्स की अध्यक्षता भारत के पास है। भारतीय अध्यक्षता के दौरान इस समूह की प्राथमिकताओं को मजबूती, नवाचार, सहयोग और सतत विकास से जोड़ते हुए आगे बढ़ाया जा रहा है। दो दिवसीय शिखर सम्मेलन में वैश्विक और क्षेत्रीय परिस्थितियों पर चर्चा के साथ-साथ साझा हितों से जुड़े मुद्दों पर ब्रिक्स देशों के बीच सहयोग को और मजबूत करने पर विचार किया जाएगा।
25 से अधिक शहरों में हो चुकी हैं 350 से ज्यादा बैठकें
भारत ने अपनी अध्यक्षता के दौरान ब्रिक्स से जुड़े कार्यक्रमों को देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचाने पर जोर दिया है। अब तक 25 से अधिक शहरों में 350 से ज्यादा बैठकें और उच्चस्तरीय कार्यक्रम आयोजित किए जा चुके हैं। शिखर सम्मेलन से पहले मुंबई में 9 और 10 सितंबर को ब्रिक्स के वित्त मंत्रियों तथा केंद्रीय बैंक के गवर्नरों की बैठक भी हो रही है। इसमें सदस्य देशों के वित्त मंत्री और केंद्रीय बैंक प्रमुख हिस्सा लेंगे।
क्या है BRICS और कैसे हुआ इसका विस्तार?
ब्रिक्स की शुरुआत 2006 में एक अनौपचारिक समूह के रूप में हुई थी। इसके बाद 16 जून 2009 को पहला औपचारिक शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया। वर्तमान में इस समूह में 11 देश शामिल हैं। इनमें ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब और इंडोनेशिया शामिल हैं।
ब्रिक्स को वैश्विक और क्षेत्रीय महत्व के मुद्दों पर विकासशील एवं उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बीच संवाद और सहयोग के मंच के रूप में देखा जाता है। भारत इसकी स्थापना से ही इसका सदस्य रहा है और पहले 2012, 2016 तथा 2021 में समूह की अध्यक्षता कर चुका है। 1 जनवरी 2026 से भारत ने चौथी बार ब्रिक्स की अध्यक्षता संभाली है। इसी वर्ष समूह की स्थापना के दो दशक भी पूरे हो रहे हैं।
भारत के लिए BRICS क्यों महत्वपूर्ण है?
ब्रिक्स भारत को चीन और रूस के साथ एक ही बहुपक्षीय मंच पर संवाद का अवसर देता है। इसके साथ ही यह भारत को विकासशील देशों और प्रमुख ऊर्जा उत्पादक अर्थव्यवस्थाओं के साथ आर्थिक एवं रणनीतिक रिश्ते मजबूत करने का मंच भी उपलब्ध कराता है।
विदेश नीति के लिहाज से भारत के लिए ब्रिक्स इसलिए भी अहम है क्योंकि इसके जरिए वह अमेरिका, यूरोप, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के साथ अपने संबंधों को आगे बढ़ाते हुए चीन और रूस के साथ भी संवाद बनाए रख सकता है। ऐसे में ब्रिक्स भारत की बहुआयामी विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाता है।
UN, IMF और World Bank में सुधार की मांग
ब्रिक्स देश लंबे समय से वैश्विक वित्तीय और बहुपक्षीय संस्थानों में सुधार की वकालत करते रहे हैं। समूह का मानना है कि संयुक्त राष्ट्र, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक जैसी संस्थाओं में निर्णय लेने की मौजूदा व्यवस्था दुनिया की बदलती आर्थिक वास्तविकताओं को पूरी तरह प्रतिबिंबित नहीं करती। उभरती अर्थव्यवस्थाएं इन संस्थानों में अपनी बढ़ती आर्थिक भूमिका के अनुरूप अधिक प्रतिनिधित्व की मांग करती रही हैं।
शी जिनपिंग की संभावित मौजूदगी क्यों अहम?
इस सम्मेलन में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की संभावित भागीदारी को विशेष महत्व दिया जा रहा है। भारत और चीन के बीच पिछले कुछ वर्षों में रिश्तों में तनाव रहा है, ऐसे में दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व की एक ही मंच पर मौजूदगी संवाद को आगे बढ़ाने का अवसर दे सकती है।
एन्सो ग्रुप के मैनेजिंग डायरेक्टर और एन्सो फाउंडेशन के प्रेसिडेंट वैभव मालू के मुताबिक भारत को अपनी ब्रिक्स अध्यक्षता का इस्तेमाल आर्थिक हितों को आगे बढ़ाने के लिए करना चाहिए। उनका सुझाव है कि भारत को निर्यात भुगतान में तेजी, प्रमाणन से जुड़ी अड़चनों को कम करने और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए वित्तीय सहयोग बढ़ाने जैसे मुद्दों को प्राथमिकता देनी चाहिए।
भारत के लिए यह शिखर सम्मेलन केवल एक बहुपक्षीय बैठक नहीं, बल्कि व्यापार, निवेश, वित्तीय सहयोग और वैश्विक मंचों पर विकासशील देशों की भूमिका को मजबूत करने के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
