विभुवन संकष्टी चतुर्थी 2026 कब है? 3 या 4 जून, जानें व्रत की सही तिथि, चंद्रोदय समय और पूजा विधि

Vibhuvan Sankashti Chaturthi 2026: अधिक मास में आने वाली विभुवन संकष्टी चतुर्थी का विशेष महत्व माना जाता है। यह दुर्लभ व्रत हर तीन साल में एक बार आता है और भगवान गणेश की पूजा के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।

विभुवन संकष्टी चतुर्थी 2026 (Image: ChatGPT)
विभुवन संकष्टी चतुर्थी 2026 (Image: ChatGPT)

Vibhuvan Sankashti Chaturthi 2026: हिंदू धर्म में संकष्टी चतुर्थी का बहुत खास महत्व बताया गया है। वहीं, अधिक मास के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली संकष्टी चतुर्थी को ‘विभुवन संकष्टी चतुर्थी’ के नाम से जाना जाता है। चूंकि अधिक मास हर 3 साल में एक बार आता है, इसलिए यह संकष्टी चतुर्थी भी प्रत्येक तीन साल में एक बार आती है। इस दिन भगवान गणेश की विधि-विधान से पूजा की जाती है और व्रत रखा जाता है। मान्यता है कि ऐसा करने से सभी संकटों का नाश होता है और जीवन में सुख-सौभाग्य के संयोग बनते हैं। इस बार अधिक मास की इस संकष्टी चतुर्थी की तारीख को लेकर लोगों में 3 और 4 जून के बीच थोड़ी उलझन बनी हुई है।

विभुवन संकष्टी चतुर्थी कब है?

पंचांग के अनुसार, अधिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि का आरंभ 3 जून, बुधवार को रात में 9 बजकर 22 मिनट पर होगा। वहीं, अगले दिन यानी 4 जून, गुरुवार को रात में 11 बजकर 31 मिनट तक यह चतुर्थी तिथि व्याप्त रहेगी। इस व्रत में चंद्रमा को अर्घ्य देने का बेहद खास महत्व होता है और चंद्रोदय का मुहूर्त पहले दिन यानी 3 तारीख को पड़ रहा है, इसलिए इसी दिन संकष्टी चतुर्थी का व्रत किया जाएगा। यही कारण है कि 4 जून को पूरे दिन चतुर्थी तिथि होने के बावजूद 3 जून, बुधवार को ही विभुवन संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखा जाएगा।

विभुवन संकष्टी चतुर्थी के शुभ मुहूर्त

साल 2026 में 3 जून, बुधवार को विभुवन संकष्टी चतुर्थी के दिन पूजा के लिए दिन और रात के कई शुभ चौघड़िया मुहूर्त उपलब्ध हैं:

  • सुबह का लाभ चौघड़िया: सुबह 5 बजकर 23 मिनट से लेकर 7 बजकर 7 मिनट तक रहेगा।
  • सुबह का अमृत चौघड़िया: सुबह 7 बजकर 7 मिनट से लेकर 8 बजकर 51 मिनट तक रहेगा।
  • सुबह का शुभ चौघड़िया: सुबह 10 बजकर 35 मिनट से लेकर 12 बजकर 19 मिनट तक रहेगा।
  • शाम का लाभ चौघड़िया: शाम को 5 बजकर 31 मिनट से लेकर 7 बजकर 15 मिनट तक रहेगा।
  • रात का शुभ चौघड़िया: रात को 8 बजकर 31 मिनट से लेकर 9 बजकर 47 मिनट तक रहेगा।
  • रात का अमृत चौघड़िया: रात को 9 बजकर 47 मिनट से लेकर 11 बजकर 3 मिनट तक रहेगा।

विभुवन संकष्टी चतुर्थी के दिन चंद्रोदय का समय रात में 10 बजकर 4 मिनट का रहेगा। इस तय समय पर व्रती चंद्रमा को अर्घ्य दे सकते हैं। ऐसा करने से कुंडली में चंद्रमा की स्थिति बेहद मजबूत होती है और जीवन में सुख-शांति के सुंदर संयोग बनते हैं।

विभुवन संकष्टी चतुर्थी की पूजन विधि

तीन साल में एक बार पड़ने वाली यह संकष्टी चतुर्थी इस बार बेहद खास रहने वाली है क्योंकि इसी दिन बुधवार का दिन भी पड़ रहा है, जो पूर्ण रूप से भगवान गणेश को ही समर्पित है। इस दिन व्रती को सुबह जल्दी उठकर स्नानादि करना चाहिए और साफ वस्त्र धारण करके सबसे पहले भगवान का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लेना चाहिए। इसके बाद पूजा घर को अच्छी तरह साफ करके वहां लकड़ी की एक चौकी पर पीला वस्त्र बिछाएं।

चौकी पर भगवान गणेश की मूर्ति या प्रतिमा स्थापित करने के बाद चारों ओर गंगाजल का छिड़काव करें। फिर गणेशजी का पंचामृत से पवित्र स्नान करवाएं और उन्हें दूर्वा जरूर अर्पित करें, क्योंकि गणपतिजी को दूर्वा बेहद प्रिय है। इसके बाद भगवान गणेश को पान, फल, फूल आदि अर्पित करें और साथ ही उन्हें मोदक का भोग भी अवश्य लगाएं। पूजा के दौरान इस बात का विशेष ख्याल रखना चाहिए कि गणेशजी को कभी भी खंडित या सूखे चावल नहीं चढ़ाने चाहिए।

इसके बाद दीपक जलाकर भगवान गणेश की विधि-विधान से पूजा करें, उनके मंत्रों का श्रद्धापूर्वक जप करें और फिर गणेशजी की आरती करें। पूरे दिन उपवास रखने के बाद शाम के समय दोबारा इसी तरह विधि-विधान से गणेशजी की पूजा करनी चाहिए। अंत में, चंद्रोदय के समय चंद्रमा को अर्घ्य जरूर देना चाहिए।

विभुवन संकष्टी चतुर्थी का महत्व

यह व्रत साधारण संकष्टी चतुर्थी से कई गुना अधिक फलदायी माना गया है क्योंकि यह भगवान विष्णु के प्रिय अधिक मास में आता है। विभुवन का अर्थ तीनों लोकों के स्वामी से भी जोड़ा जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन विघ्नहर्ता गणेश जी की पूजा करने से जीवन के बड़े से बड़े आर्थिक, शारीरिक या मानसिक संकट चुटकियों में खत्म हो जाते हैं। इस विशेष दिन पर व्रत रखने और दान करने से कुंडली के ग्रह दोष, विशेषकर चंद्र दोष दूर होते हैं। प्राचीन कथाओं के अनुसार, राजा नहुष ने भी इसी परम फलदायी व्रत को करके अपने सारे संकटों से मुक्ति पाई थी और उन्हें दोबारा इंद्र का सिंहासन प्राप्त हुआ था। इस तरह यह व्रत समस्त दोषों से मुक्ति दिलाने वाला, संकटों का नाश करने वाला तथा भक्तों की हर इच्छा को पूर्ण करने वाला माना गया है।

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