नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने देश की संसद और राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने की प्रक्रिया को तेज करने का मन बना लिया है। ताजा घटनाक्रम के अनुसार, सरकार ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ में संशोधन कर इसे साल 2034 के बजाय 2029 के लोकसभा चुनाव से ही लागू करने की योजना बना रही है। इस ऐतिहासिक कदम को अमलीजामा पहनाने के लिए सरकार ने विभिन्न राजनीतिक दलों के साथ बातचीत और संवाद की प्रक्रिया तेज कर दी है। समझा जाता है कि वर्तमान बजट सत्र के दौरान ही इस संबंध में एक नया संशोधन विधेयक पेश किया जा सकता है, जिसके लिए विपक्षी दलों से संपर्क साधा जा रहा है।
प्रस्तावित योजना के तहत, 2027 में होने वाली राष्ट्रीय जनगणना से पहले ही लोकसभा सीटों का परिसीमन शुरू करने की तैयारी है। यदि यह संशोधन बिल पारित होता है, तो लोकसभा की वर्तमान 543 सीटों में 33 प्रतिशत की बढ़ोतरी के साथ कुल सीटों की संख्या 814 हो जाएगी, जिनमें से 272 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। बड़े राज्यों में सीटों की संख्या 33 प्रतिशत आरक्षण के फार्मूले के आधार पर बढ़ाई जाएगी, जबकि बहुत छोटे राज्यों में, जहां केवल एक या दो सीटें हैं, वहां बारी-बारी से (रोटेशन के आधार पर) महिला आरक्षण लागू करने का प्रावधान हो सकता है। सरकार इस महत्वपूर्ण विधेयक को पहले राज्यसभा में पेश करने पर विचार कर रही है।
राजनीतिक स्तर पर इस पहल को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी गृहमंत्री अमित शाह और संसदीय कार्यमंत्री किरेन रिजीजू ने संभाली है। रिजीजू ने राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को पत्र लिखकर इस मुद्दे पर विस्तृत चर्चा का निमंत्रण दिया है। हालांकि विपक्षी खेमे से मिली-जुली प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने पहले ही इस अधिनियम को तत्काल लागू करने की मांग उठाई थी, और हाल ही में राहुल गांधी ने भी 2029 के चुनाव से इसे प्रभावी बनाने पर जोर दिया था। तृणमूल कांग्रेस और वामपंथी दलों की ओर से भी इस संशोधन को समर्थन मिलने की संभावना है।
हालांकि, कुछ क्षेत्रीय दलों की ओर से पेंच फंस सकता है। समाजवादी पार्टी (सपा), राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और द्रमुक जैसे दल महिला आरक्षण के भीतर अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए अलग से ‘कोटे के भीतर कोटा’ की मांग दोहरा सकते हैं। सरकार की कोशिश है कि एक सर्वदलीय बैठक बुलाकर इन तकनीकी और वैचारिक मतभेदों को सुलझा लिया जाए, ताकि 2029 के आम चुनाव से पहले देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं में महिलाओं की भागीदारी का नया अध्याय शुरू हो सके।
