भाजपा ने 2027 के चुनावी समर से पहले अपनी नई टीम का आधिकारिक एलान कर दिया है। इस नई सूची में सबसे अधिक चर्चा राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के नाम की हो रही है, जिन्हें पार्टी ने राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी है। भाजपा के इस कदम से यह स्पष्ट संदेश मिलता है कि पार्टी अब अपने वरिष्ठ और जनाधार वाले नेताओं के मामले में बेहद सावधानी बरत रही है।
राजस्थान की राजनीति में दबदबा और पुराना रिकॉर्ड
वसुंधरा राजे राजस्थान की राजनीति में एक बेहद लोकप्रिय चेहरा रही हैं। वर्ष 2003 में जब भाजपा ने पहली बार उनके नेतृत्व में चुनाव लड़ा, तो पार्टी ने 120 सीटों पर जीत दर्ज की थी। इसके बाद 2013 के चुनावों में मोदी लहर के दौरान भाजपा राजे के नेतृत्व में 163 सीटों के ऐतिहासिक आंकड़े तक पहुंची। हालांकि, 2023 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने अपनी रणनीति बदलते हुए नए नेतृत्व को उभारने की कोशिश की और राजे को दरकिनार किया। उन्हें पूरे राज्य में प्रचार तक नहीं करने दिया गया और 200 में से केवल 54 सीटों की जिम्मेदारी दी गई, जबकि लगभग 70 सीटों पर उनका सीधा प्रभाव माना जाता था। नतीजतन, भाजपा 115 सीटों पर सिमट गई—जो राजे के नेतृत्व में लड़े गए पहले चुनाव से भी 5 सीटें कम थी।
लोकसभा चुनाव के झटके से सबक
चुनाव बाद पार्टी ने भजन लाल शर्मा को मुख्यमंत्री बनाया और राजे को राज्य की राजनीति में हाशिए पर धकेल दिया गया। इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में वसुंधरा राजे ने केवल झालावाड़-बारां सीट पर प्रचार किया, जहां से उनके बेटे दुष्यंत सिंह मैदान में थे। इसका असर यह हुआ कि जहां पिछले चुनाव में भाजपा ने राजस्थान की सभी 25 सीटें जीती थीं, वहीं 2024 में उसे 11 सीटों पर हार का सामना करना पड़ा। इन नतीजों ने साफ कर दिया कि राज्य की जनता नई व्यवस्था को पूरी तरह स्वीकार करने के मूड में नहीं थी।
2028 के चुनाव और महिला वोट बैंक पर नजर
वर्तमान में भजन लाल सरकार का आधा कार्यकाल पूरा हो चुका है और 2028 के आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए भाजपा कोई जोखिम नहीं उठाना चाहती। सामंती सोच वाले राज्य में वसुंधरा राजे का शाही रसूख और महिला मतदाताओं के बीच उनकी मजबूत पकड़ पार्टी के लिए चुनावी नतीजों में अहम भूमिका निभा सकती है। आगामी चुनावों में एंटी-इनकंबेंसी (सत्ता-विरोधी लहर) से निपटने के लिए भी पार्टी ने राजे को आगे करने की रणनीति बनाई है। राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाकर पार्टी ने यह दर्शाने का प्रयास किया है कि संगठन में उनका कद और अहमियत आज भी बरकरार है, हालांकि यह दांव कितना कारगर होगा, यह आने वाला वक्त तय करेगा।
