संसद बजट सत्र: राहुल गांधी को बोलने से रोकने पर विवाद, ओम बिरला के खिलाफ विपक्ष का अविश्वास प्रस्ताव

संसद के बजट सत्र का दूसरा चरण आज से शुरू हो गया है, और उम्मीद के मुताबिक यह बेहद हंगामेदार रहने वाला है। इस सत्र का केंद्र बिंदु लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ विपक्ष द्वारा लाया गया अविश्वास प्रस्ताव है।

संसद के बजट सत्र का दूसरा चरण आज से शुरू हो गया है, और उम्मीद के मुताबिक यह बेहद हंगामेदार रहने वाला है। इस सत्र का केंद्र बिंदु लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ विपक्ष द्वारा लाया गया अविश्वास प्रस्ताव है। हालांकि संख्या बल के आधार पर इस प्रस्ताव का गिरना लगभग तय माना जा रहा है, लेकिन विपक्ष ने इस कानूनी दांव-पेच के जरिए स्पीकर को सदन की कार्यवाही के संचालन से दूर रखकर अपनी एक बड़ी रणनीतिक जीत दर्ज कर ली है।

इस पूरे विवाद की जड़ बजट सत्र के पहले चरण में छिपी है। दरअसल, सदन में उस वक्त गतिरोध पैदा हो गया जब नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी बजट पर चर्चा के दौरान पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की एक अप्रकाशित किताब के अंशों का हवाला देना चाहते थे। राहुल गांधी का तर्क था कि वे चीन के साथ सीमा विवाद पर देश के सामने महत्वपूर्ण तथ्य रखना चाहते हैं, लेकिन स्पीकर ओम बिरला ने इसे नियमों (Rule 349) के विरुद्ध बताते हुए अनुमति नहीं दी। बिरला का कहना था कि बजट सत्र के दौरान चर्चा केवल बजट पर केंद्रित होनी चाहिए। राहुल गांधी ने इसे अपनी आवाज दबाने की कोशिश करार दिया और कहा कि इतिहास में पहली बार नेता प्रतिपक्ष को बोलने से रोका जा रहा है।

विपक्ष ने इस ‘पक्षपात’ के खिलाफ एकजुट होकर स्पीकर को हटाने का नोटिस दे दिया। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, डीएमके और वामपंथी दलों सहित कुल 118 सांसदों के हस्ताक्षर वाले इस प्रस्ताव ने तकनीकी रूप से ओम बिरला को ‘खामोश’ कर दिया है। संसदीय परंपरा और निष्पक्षता के सिद्धांतों के अनुसार, जब तक किसी अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लंबित रहता है, वह सदन की अध्यक्षता नहीं कर सकता। यही कारण है कि पिछले महीने नोटिस दिए जाने के बाद से ओम बिरला ने खुद को सदन की कार्यवाही से पूरी तरह अलग कर लिया है और वर्तमान में डिप्टी स्पीकर या पैनल के वरिष्ठ सदस्य सदन चला रहे हैं।

संवैधानिक रूप से देखा जाए तो लोकसभा अध्यक्ष को हटाने के लिए साधारण बहुमत की आवश्यकता होती है। यदि मतदान के समय सदन में मौजूद सदस्यों में से आधे से एक अधिक सदस्य प्रस्ताव के पक्ष में वोट करते हैं, तो अध्यक्ष को पद छोड़ना पड़ता है। विपक्ष इस मुद्दे पर पूरी तरह लामबंद है, लेकिन दूसरी ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पूरे एनडीए गठबंधन ने ओम बिरला को अपना अटूट समर्थन दिया है। एनडीए के पास सदन में स्पष्ट बहुमत है, जिसके चलते इस प्रस्ताव के पारित होने की संभावना न के बराबर है।

भारतीय संसदीय इतिहास में यह केवल चौथा मौका है जब किसी स्पीकर के खिलाफ ऐसा प्रस्ताव लाया गया है। इससे पहले 1954 में जी.वी. मावलंकर, 1966 में हुकम सिंह और 1987 में बलराम जाखड़ के खिलाफ भी ऐसे प्रयास हुए थे, लेकिन हर बार प्रस्ताव गिर गया। इस बार भी परिणाम शायद वही रहे, लेकिन विपक्ष का मुख्य उद्देश्य सफल होता दिख रहा है। उन्होंने न केवल अपनी एकजुटता प्रदर्शित की है, बल्कि एक महत्वपूर्ण बजट सत्र के दौरान स्पीकर को पीठासीन अधिकारी की कुर्सी से हटाकर अपनी नाराजगी का कड़ा संदेश भी दे दिया है।

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