Kailash Mansarovar Yatra 2026: लिपुलेख मार्ग पर नेपाल की आपत्ति, भारत ने दिया सख्त जवाब

India Nepal Lipulekh border dispute: कैलाश मानसरोवर यात्रा को लेकर भारत और नेपाल के बीच एक बार फिर सीमा विवाद उभर आया है। नेपाल की नई सरकार ने रविवार, 3 मई 2026 को लिपुलेख मार्ग से होने वाली यात्रा पर आपत्ति जताते हुए अपने क्षेत्रीय दावे दोहराए, जिसके बाद भारत के विदेश मंत्रालय ने साफ शब्दों में जवाब दिया है।

भारत नेपाल लिपुलेख सीमा विवाद (Image: Wikipedia)
भारत नेपाल लिपुलेख सीमा विवाद (Image: Wikipedia)

कैलाश मानसरोवर यात्रा को लेकर भारत और नेपाल के बीच एक बार फिर कूटनीतिक विवाद गहरा गया है। नेपाल की नई बालेन शाह सरकार ने रविवार को लिपुलेख दर्रे के माध्यम से होने वाली यात्रा पर आपत्ति जताते हुए सीमा संबंधी नए दावे पेश किए हैं। इस पर भारतीय विदेश मंत्रालय ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए स्पष्ट किया है कि लिपुलेख दर्रा साल 1954 से कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए एक स्थापित मार्ग रहा है और पिछले कई दशकों से श्रद्धालु इसी रास्ते का उपयोग कर रहे हैं। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि यह कोई नया घटनाक्रम नहीं है और भारत का रुख इस मामले में हमेशा से स्थिर और स्पष्ट रहा है।

भारत ने नेपाल द्वारा किए गए इन क्षेत्रीय दावों को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। विदेश मंत्रालय ने कहा कि इस तरह के दावे न तो ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित हैं और न ही इनमें कोई पुख्ता सबूत नजर आता है। भारत ने जोर देकर कहा कि क्षेत्रीय दावों का एकतरफा और कृत्रिम विस्तार किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं किया जाएगा। हालांकि, भारत ने यह भी साफ किया है कि वह अपने पड़ोसी देश नेपाल के साथ सभी लंबित द्विपक्षीय मुद्दों और सीमा विवादों को रचनात्मक संवाद, बातचीत और कूटनीति के माध्यम से सुलझाने के लिए हमेशा तैयार है।

इससे पहले नेपाल के विदेश मंत्रालय ने एक विरोध पत्र जारी कर दावा किया था कि 1816 की सुगौली संधि के अनुसार लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी का इलाका नेपाल की संप्रभुता का हिस्सा है। नेपाल ने भारत से इस क्षेत्र में सड़क निर्माण और तीर्थयात्रा जैसी गतिविधियां न करने की अपील की है और इस संबंध में चीन को भी आधिकारिक तौर पर सूचित किया है। नेपाल के इन विरोधों के बावजूद भारत ने कैलाश मानसरोवर यात्रा 2026 के लिए अपना पूरा कार्यक्रम जारी कर दिया है।

इस वर्ष की कैलाश मानसरोवर यात्रा उत्तराखंड के लिपुलेख और सिक्किम के नाथुला दर्रे के माध्यम से ही संचालित की जाएगी। इस यात्रा के लिए कुल एक हजार श्रद्धालुओं का चयन किया गया है, जिन्हें दोनों मार्गों से दस-दस बैचों में भेजा जाएगा। यात्रा का पहला जत्था 4 जुलाई को दिल्ली से रवाना होने वाला है, जिसके लिए यात्रियों की मेडिकल जांच और अन्य आधिकारिक औपचारिकताएं 30 जून से 3 जुलाई के बीच पूरी की जाएंगी। भारत ने यह संकेत दे दिया है कि वह अपनी दशकों पुरानी धार्मिक और सांस्कृतिक यात्रा को अपने स्थापित मार्गों से जारी रखने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।

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