देशभर में एलपीजी संकट की आशंका के बीच मची अफरा-तफरी को शांत करने के लिए केंद्र सरकार ने एक महत्वपूर्ण घोषणा की है। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि घरेलू उपभोक्ताओं को घबराने या सिलेंडरों की जमाखोरी करने की आवश्यकता नहीं है। सरकार के अनुसार, अब बुकिंग के औसतन ढाई दिनों के भीतर सिलेंडर की डिलीवरी सुनिश्चित की जाएगी, जो कि संकट से पहले की सामान्य स्थिति के समान ही है। इस कदम का उद्देश्य उपभोक्ताओं के बीच फैले डर को कम करना और वितरण प्रणाली पर पड़ रहे अतिरिक्त दबाव को नियंत्रित करना है।
मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने अंतर-मंत्रालय संवाददाता सम्मेलन में बताया कि घरेलू एलपीजी के उत्पादन को बढ़ाने के लिए युद्ध स्तर पर प्रयास किए जा रहे हैं। सरकारी रिफाइनरियों को विशेष निर्देश दिए गए हैं, जिसके परिणामस्वरूप पिछले कुछ दिनों में उत्पादन में 25 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। इसके अलावा, रसोई गैस के दुरुपयोग को रोकने के लिए ‘डिलिवरी प्रमाणन कोड’ (DAC) प्रणाली को कड़ाई से लागू किया जा रहा है। सरकार का लक्ष्य है कि कम से कम 90 प्रतिशत उपभोक्ताओं को इस डिजिटल सत्यापन प्रक्रिया के दायरे में लाया जाए, ताकि गैस की कालाबाजारी पर पूरी तरह लगाम कसी जा सके।
पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के कारण भारत की ऊर्जा सुरक्षा के सामने बड़ी चुनौतियां खड़ी हुई हैं। भारत अपनी एलपीजी जरूरतों का 60 प्रतिशत आयात करता है और इस आयात का 90 प्रतिशत हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते आता है, जो वर्तमान में संघर्ष का केंद्र बना हुआ है। सुजाता शर्मा ने जानकारी दी कि देश की दैनिक गैस खपत 18.9 करोड़ मानक घन मीटर है, जिसमें से करीब 4.7 करोड़ घन मीटर की आपूर्ति युद्ध की वजह से प्रभावित हुई है। इस कमी को पूरा करने के लिए सरकार वैकल्पिक अंतरराष्ट्रीय स्रोतों से संपर्क कर रही है और वर्तमान में तरल एलएनजी के दो बड़े टैंकर भारत के रास्ते में हैं।
बढ़ती अंतरराष्ट्रीय कीमतों के बावजूद सरकार ने कीमतों को नियंत्रित रखने का प्रयास किया है। वर्तमान में दिल्ली में एलपीजी सिलेंडर की कीमत 913 रुपये है, जबकि उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों को यह 613 रुपये में उपलब्ध कराया जा रहा है। सरकार ने एक नया नियंत्रण आदेश भी जारी किया है, जिसके तहत उपलब्ध गैस की आपूर्ति में घरेलू रसोइयों, अस्पतालों, परिवहन और शैक्षणिक संस्थानों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। इसके साथ ही उर्वरक क्षेत्र को 70 प्रतिशत आपूर्ति सुरक्षित की गई है, जबकि तेल शोधन संयंत्रों को अपने स्वयं के उपभोग में 35 प्रतिशत तक की कटौती करने के निर्देश दिए गए हैं ताकि आम जनता को ईंधन की कमी का सामना न करना पड़े।
