दिल्ली यूनिवर्सिटी स्टूडेंट यूनियन (डूसू) चुनाव में वाइस प्रेसिडेंट पद पर निर्दलीय उम्मीदवार दीपांशु शौकीन ने ऐतिहासिक जीत दर्ज कर सभी को चौंका दिया है। डूसू चुनावों के इतिहास में यह पहला मौका है जब किसी निर्दलीय उम्मीदवार ने वाइस प्रेसिडेंट का पद जीता है। दीपांशु कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई से जुड़े थे, लेकिन टिकट न मिलने के बाद उन्होंने निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरने का फैसला किया था। इस चुनाव में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ने चार में से तीन पदों पर कब्जा जमाया, जबकि एनएसयूआई एक भी पद हासिल करने में नाकाम रही।
दीपांशु शौकीन ने 30,615 वोट हासिल कर जीत दर्ज की और चुनाव परिणाम के बाद कांग्रेस व एनएसयूआई की हार की कमियों पर अपनी राय रखी। उनका मानना है कि पार्टी की सीनियर लीडरशिप और जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं के बीच बहुत बड़ा गैप है। उन्होंने कहा कि शीर्ष नेतृत्व जमीनी सच्चाई से दूर रहता है, जिससे योग्य और काबिल उम्मीदवारों की पहचान नहीं हो पाती। अंदरूनी राजनीति या बाहरी दबाव के चलते गलत लोगों को टिकट बांट दिए जाते हैं, जिससे काबिल कार्यकर्ता पीछे छूट जाते हैं और अंततः पार्टी को भारी नुकसान उठाना पड़ता है।
दीपांशु ने कहा कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी की ‘छात्रों की गूंज’ जैसी मुहिमों को जेन-जी (युवा पीढ़ी) काफी पसंद करती है, लेकिन इस पहल को धरातल पर उतारने की जिम्मेदारी जिस नेतृत्व के पास है, वह जमीनी स्तर पर आता ही नहीं है। नीचे के स्तर की बातें और कार्यकर्ताओं की वास्तविक भावनाएं ऊपर तक पहुँच ही नहीं पाती हैं, जिसकी वजह से छात्र राजनीति में पार्टी को झटका लगा है।
दीपांशु शौकीन का सफर काफी संघर्षपूर्ण रहा है। उनके पिता एक बस कंडक्टर हैं। दीपांशु ने भगत सिंह कॉलेज से ग्रेजुएशन पूरा किया है और वर्तमान में वे दिल्ली यूनिवर्सिटी से बुद्धिस्ट स्टडीज की पढ़ाई कर रहे हैं। वे पिछले चार सालों से लगातार छात्रों के बीच रहकर जमीनी मुद्दों को उठा रहे थे। चुनाव प्रचार के दौरान वे नंगे पैर ही प्रचार करते दिखे थे। दरअसल, सत्य निकेतन में एक पीजी बिल्डिंग हादसे के बाद उन्होंने फैसला किया था कि वे नंगे पैर ही चुनाव प्रचार करेंगे ताकि छात्रों की समस्याओं और तकलीफों को खुद महसूस कर सकें।
