उत्तर प्रदेश में भले ही शिक्षकों के हजारों पदों पर नई भर्तियां निकाली जा रही हों, लेकिन वर्ष 2018 की 69 हजार सहायक शिक्षक भर्ती का विवाद अब तक सुलझ नहीं पाया है। इस बहुचर्चित मामले में सुप्रीम कोर्ट में एक बार फिर अहम सुनवाई हुई, जहां चयनित अभ्यर्थियों और अन्य पक्षों की तरफ से वकीलों ने अपनी-अपनी दलीलें पेश कीं। सुनवाई के दौरान चयनित अभ्यर्थियों की ओर से पेश हुए वकील ने कहा कि अगर लखनऊ हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा जाता है, तो पिछले 6 सालों से नौकरी कर रहे लगभग 10 हजार शिक्षक इस प्रक्रिया से बाहर हो जाएंगे। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा कि जो नियम के अनुसार सही होगा, उसी के आधार पर अंतिम निर्णय लिया जाएगा।
आरक्षण और टीईटी में छूट पर उठाए गए सवाल
सुनवाई के दौरान चयनित अभ्यर्थियों के वकील ने दलील दी कि आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को पहले टीईटी (शिक्षक पात्रता परीक्षा) में आरक्षण की छूट दी गई थी, जिसके बाद वे सहायक अध्यापक भर्ती परीक्षा में भी पुनः आरक्षण का लाभ ले रहे हैं। वकील ने तर्क दिया कि एक ही भर्ती प्रक्रिया के दौरान दो बार आरक्षण का लाभ लिया जा रहा है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए टिप्पणी की कि टीईटी कोई भर्ती परीक्षा नहीं बल्कि केवल एक पात्रता परीक्षा है, इसलिए इसे दो बार आरक्षण लेने का मामला नहीं कहा जा सकता।
वकील ने आगे दलील दी कि यदि इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के आधार पर भर्ती प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाती है, तो केवल 817 अनारक्षित अभ्यर्थियों को ही नौकरी मिल पाएगी, जबकि आरक्षित वर्ग के प्रभावित उम्मीदवारों की संख्या इससे काफी अधिक है। इस पर अदालत ने साफ किया कि जो भी अभ्यर्थी चयनित होने का कानूनी अधिकार रखते हैं, उन्हें हर हाल में भर्ती प्रक्रिया का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
सामान्य वर्ग में माइग्रेशन को लेकर बहस
चयनित अभ्यर्थियों की तरफ से पेश हुईं वरिष्ठ वकील शोभा गुप्ता ने कहा कि भर्ती प्रक्रिया के दौरान किसी भी स्तर पर आरक्षण की छूट का लाभ लेने वाले अभ्यर्थी अधिक अंक पाने के बावजूद सामान्य वर्ग की सीटों पर माइग्रेट करने का दावा नहीं कर सकते। उन्होंने अपने तर्क के समर्थन में सुप्रीम कोर्ट के ही कुछ पुराने फैसलों का हवाला भी दिया। अदालत अब इस मामले में आरक्षण व्यवस्था से प्रभावित अभ्यर्थियों के वकीलों की दलीलें सुनेगी, जिसके लिए अगली सुनवाई की तारीख 22 सितंबर तय की गई है।
क्या है 69 हजार शिक्षक भर्ती का पूरा मामला?
उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 5 दिसंबर 2018 को 69 हजार सहायक शिक्षकों की भर्ती के लिए अधिसूचना जारी की गई थी। इसके लिए 4 लाख से अधिक उम्मीदवारों ने आवेदन किया था और 6 जनवरी 2019 को लिखित परीक्षा आयोजित की गई थी। इसके बाद 12 मई 2020 को घोषित परिणाम में लगभग 1.47 लाख अभ्यर्थी पास हुए, जिसमें सामान्य वर्ग के लिए कटऑफ 67.11 प्रतिशत और ओबीसी वर्ग के लिए 66.73 प्रतिशत रही थी।
आरक्षण में गड़बड़ी के आरोप और अदालती चक्रव्यूह
परिणाम घोषित होने के बाद आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों ने आरोप लगाया कि अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित हजारों सीटों पर सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियों को नियुक्तियां दे दी गईं। आरक्षित वर्ग का दावा था कि इस विसंगति के कारण योग्य होते हुए भी वे नौकरी पाने से वंचित रह गए। मामला हाईकोर्ट पहुंचा, जहां अदालत ने पुरानी मेरिट लिस्ट को रद्द करते हुए राज्य सरकार को तीन महीने के भीतर नई संशोधित सूची जारी करने का आदेश दिया।
हालांकि, हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ कुछ अभ्यर्थी सुप्रीम कोर्ट चले गए, जिसके बाद काउंसलिंग प्रक्रिया पर रोक लगा दी गई। सुप्रीम कोर्ट ने 2020 में सुनवाई करते हुए कुल 69 हजार पदों में से 37,339 पदों पर भर्ती की प्रक्रिया को होल्ड कर दिया था और बाकी बचे 31,661 पदों पर ही नियुक्ति पत्र जारी करने का आदेश दिया था। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में इस पूरे मामले पर अंतिम स्पष्टता के लिए सुनवाई जारी है।
