होर्मुज खुलते ही भारत को बड़ी सौगात, 40 टैंकर लेकर आ रहे तेल-गैस; ईरान ने बढ़ाई नई चिंता

अमेरिका-ईरान शांति समझौते के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य फिर से खुल गया है। इससे भारत को LPG, LNG, कच्चे तेल और उर्वरकों की आपूर्ति में बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है। ऊर्जा सुरक्षा, तेल कीमतों और कृषि क्षेत्र पर इसके सकारात्मक प्रभाव पड़ सकते हैं।

Strait of Hormuz Opens
Strait of Hormuz Opens

दुनिया भर के तमाम देशों को जिस पल का बेसब्री से इंतजार था, वो घड़ी आखिरकार आ गई है। अमेरिका और ईरान के बीच ऐतिहासिक पीस डील (शांति समझौते) पर सहमति बनने के बाद पश्चिम एशिया में कई महीनों से भड़की जंग की आग अब शांत होने की ओर बढ़ रही है। इस समझौते के तुरंत बाद अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों पर लगाई गई अपनी नौसैनिक नाकेबंदी को पूरी तरह समाप्त कर दिया है। इसके साथ ही, वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा बाजार के गले की नस माना जाने वाला दुनिया का सबसे संवेदनशील समुद्री रास्ता यानी ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ (Strait of Hormuz) जहाजों के लिए फिर से खोल दिया गया है। इस महत्वपूर्ण एनर्जी कॉरिडोर के दोबारा सक्रिय होने से अब एलपीजी (LPG), एलएनजी (LNG) और कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय आवाजाही पहले की तरह सुगम हो सकेगी।

यह पूरा घटनाक्रम भारत जैसे विकासशील देश के लिए किसी बहुत बड़ी खुशखबरी से कम नहीं है, जो अपनी तीन-चौथाई से भी अधिक ऊर्जा जरूरतों के लिए पूरी तरह पश्चिम एशियाई देशों (खाड़ी देशों) पर निर्भर रहता है। होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने से भारतीय घरों के चूल्हों पर जो संकट मंडरा रहा था, वह फिलहाल टल गया है। हालांकि, इन सबके बीच तेहरान (ईरान) की एक नई जिद ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर थोड़ी टेंशन जरूर बढ़ा दी है। ईरान सरकार का कहना है कि समझौते के तहत तय 60 दिनों की अस्थायी युद्धविराम अवधि समाप्त होने के बाद, वह होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले सभी विदेशी जहाजों और तेल टैंकरों से एक निश्चित ‘टोल टैक्स’ (टोल शुल्क) वसूलेगा।

‘टेलीग्राफ’ की एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार, होर्मुज स्ट्रेट के खुलते ही भारत की ओर बढ़ रहे लगभग 40 बड़े जहाजों में सबसे अधिक बेसब्री से उन पोतों का इंतजार किया जा रहा है जो भारी मात्रा में एलपीजी (रसोई गैस) लेकर आ रहे हैं। ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि इस युद्ध और समुद्री नाकेबंदी के कारण हाल के महीनों में भारत का एलपीजी आयात सबसे बुरी तरह प्रभावित हुआ था और यह घटकर अपने सामान्य स्तर के महज 51 प्रतिशत पर सिमट गया था। इसके चलते भारतीय बाजारों में घरेलू मांग को पूरा करने के लिए गैस सिलेंडरों के भंडार की तत्काल भरपाई करने की एक बड़ी चुनौती पैदा हो गई थी। अब उम्मीद जताई जा रही है कि यदि क्षेत्र में कूटनीतिक स्थिरता बनी रहती है, तो फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ने वाले इस बेहद महत्वपूर्ण मार्ग पर यातायात धीरे-धीरे पूरी तरह सामान्य हो जाएगा। मालूम हो कि दुनिया के कुल तेल व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा अकेले इसी संकरे समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है।

विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस वैश्विक एनर्जी कॉरिडोर से भारत को होने वाली ऊर्जा आपूर्ति की बहाली चरणबद्ध तरीके से की जाएगी। इसमें सबसे पहले एलपीजी और एलएनजी की खेप में तेजी से सुधार देखने को मिल सकता है, क्योंकि खाड़ी क्षेत्र के सभी प्रमुख एक्सपोर्ट टर्मिनल अब अपने सामान्य ऑपरेशन्स की ओर लौट रहे हैं और समुद्र में मालवाहक जहाजों की उपलब्धता भी बढ़ रही है। इसके विपरीत, कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) की आपूर्ति संकट के इस दौर में भी भारतीय रिफाइनरियों के लिए अपेक्षाकृत मजबूत बनी रही थी। इसका कारण यह था कि तेल से लदे कई टैंकर होर्मुज स्ट्रेट में बवाल बढ़ने और रास्ता बंद होने से पहले ही भारत के लिए रवाना हो चुके थे, साथ ही भारतीय तेल कंपनियों ने सूझबूझ दिखाते हुए दुनिया के विभिन्न अन्य वैकल्पिक स्रोतों से तेल खरीदकर अपनी घरेलू आपूर्ति को टूटने नहीं दिया था। यही वजह है कि कच्चे तेल का आयात धीमा जरूर पड़ा था, लेकिन पूरी तरह ठप नहीं हुआ था। इसी का नतीजा है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड का भाव भी हाल के महीनों के अपने सबसे निचले स्तर के करीब स्थिर बना हुआ है।

होर्मुज स्ट्रेट के दोबारा सामान्य होने से भारत के पेट्रोलियम रिफाइनिंग क्षेत्र को भी बहुत बड़ा बूस्ट मिलने की उम्मीद है। खाड़ी देशों से कच्चे तेल की आसान उपलब्धता, कम मालभाड़ा और समुद्री बीमा लागत में आने वाली कमी के कारण भारत की तमाम रिफाइनरियां अब अपनी पूरी क्षमता के साथ काम कर सकेंगी। विशेषकर, राजस्थान में हाल ही में शुरू हुई नई बाड़मेर रिफाइनरी में उत्पादन बढ़ने से भारत के डीजल, पेट्रोल और जेट ईंधन (Aviation Turbine Fuel) के निर्यात को वैश्विक स्तर पर और अधिक बल मिल सकता है। हालांकि, भले ही पश्चिम एशिया का यह बड़ा संकट अभी टलता हुआ दिख रहा हो, लेकिन भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के पूर्व गवर्नर और जाने-माने अर्थशास्त्री रघुराम राजन ने इसे भारत के लिए एक बड़ी चेतावनी और सबक बताया है।

रघुराम राजन ने देश के नीति निर्माताओं को सलाह देते हुए आगाह किया है कि भारत को भविष्य में ऐसे किसी भी अचानक लगने वाले भू-राजनीतिक झटकों से अपने नागरिकों को बचाने के लिए देश के भीतर बड़े पैमाने पर ‘रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार’ (Strategic Petroleum Reserves) को विकसित करना होगा। इसके साथ ही, हमें हमेशा ऊर्जा आपूर्ति के नए वैकल्पिक स्रोत और आपातकालीन बैकअप योजनाएं तैयार रखनी चाहिए। राजन ने यह भी सचेत किया कि भारत को केवल ऊर्जा या तेल क्षेत्र ही नहीं, बल्कि अपने दवा उद्योग (फार्मास्युटिकल सेक्टर) जैसे अन्य सभी महत्वपूर्ण और जीवन रक्षक क्षेत्रों में भी कच्चे माल या आपूर्ति के लिए किसी एक देश अथवा एक ही समुद्री मार्ग पर अत्यधिक निर्भर रहने की आदत से हर हाल में बचना चाहिए।

ऊर्जा संकट टलने के साथ ही भारत के कृषि क्षेत्र के लिए भी इस शांति समझौते से एक बहुत बड़ी राहत की खबर आई है। पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव के कारण भारत के लिए जरूरी खाद (उर्वरक) लेकर आ रहे 16 बड़े मालवाहक जहाज पिछले कई दिनों से इसी होर्मुज स्ट्रेट के बीच में फंसे हुए थे, जिनके अब रास्ता साफ होने के बाद जल्द ही भारतीय बंदरगाहों पर पहुंचने की संभावना बढ़ गई है। इस संबंध में केंद्रीय उर्वरक मंत्रालय की संयुक्त सचिव बंदना प्रेयशी ने महत्वपूर्ण डेटा साझा करते हुए बताया था कि इन फंसे हुए जहाजों में भारतीय किसानों के लिए यूरिया, डीएपी (DAP), अमोनिया और सल्फर की एक बहुत बड़ी खेप भेजी जा रही है।

मंत्रालय के अनुसार, जलडमरूमध्य में रुके हुए इन जहाजों में से 8 पोत लगभग 3.3 लाख मीट्रिक टन यूरिया, 4 जहाज 2.57 लाख टन डाय-अमोनियम फॉस्फेट (डीएपी), 1 जहाज अमोनिया तथा 3 जहाज 1.1 लाख टन सल्फर लेकर भारत की तरफ बढ़ रहे हैं। उन्होंने देश के किसानों को आश्वस्त करते हुए बताया कि आने वाले खरीफ सीजन की भारी मांग को समय रहते पूरा करने के लिए भारत सरकार पहले ही अंतरराष्ट्रीय बाजारों से 50 लाख टन उर्वरकों का अग्रिम आयात सुरक्षित कर चुकी है और इसके साथ ही देश के भीतर भी घरेलू उत्पादन को काफी बढ़ा दिया गया है। इसके अतिरिक्त, सरकार ने सुरक्षा के लिहाज से 17 लाख टन और यूरिया के आयात के लिए एक बड़ी वैश्विक निविदा (ग्लोबल टेंडर) भी जारी की है ताकि देश में खाद की कोई किल्लत न हो।

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