अमेरिका और ईरान के बीच ऐतिहासिक समझौता, 47 साल की दुश्मनी के बाद स्विट्जरलैंड में महावार्ता आज

US-Iran Peace Deal: अमेरिका और ईरान 60 दिन के युद्धविराम और ऐतिहासिक शांति प्रक्रिया पर सहमत हुए हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य खुलने, तेल कीमतों में गिरावट और परमाणु वार्ता को लेकर दुनिया की नजर स्विट्जरलैंड बैठक पर टिकी है।

47 वर्षों की कटुता और 107 दिनों तक चले संघर्ष के बाद अमेरिका और ईरान शुक्रवार को स्विट्जरलैंड के बर्गेनस्टाक रिजॉर्ट में ऐतिहासिक शांति वार्ता के लिए आमने-सामने होंगे। इस बैठक में दोनों देशों के बीच हुए प्रारंभिक समझौते के क्रियान्वयन और आगे की प्रक्रिया पर चर्चा की जाएगी।

इससे पहले बुधवार रात (भारतीय समयानुसार गुरुवार तड़के) अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फ्रांस के वर्साय पैलेस में फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के साथ रात्रिभोज के दौरान 14 सूत्रीय प्रारंभिक समझौता मसौदे (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते को ‘इस्लामाबाद मेमोरैंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग’ नाम दिया गया है।

तेहरान में ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने भी इस मसौदे पर हस्ताक्षर किए, जबकि मध्यस्थ और गारंटर की भूमिका में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने दस्तखत किए। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के अनुसार, डिजिटल हस्ताक्षरों के साथ ही यह समझौता तत्काल प्रभाव से लागू हो गया।

पहले दोनों देशों के बीच शुक्रवार को स्विट्जरलैंड में आमने-सामने हस्ताक्षर होने थे, लेकिन महत्वपूर्ण वार्ता में समय बचाने के लिए इसे पहले ही मंजूरी दे दी गई। रॉयटर्स ने स्विट्जरलैंड के विदेश मंत्रालय के हवाले से बताया कि वार्ता में अमेरिका और ईरान के प्रतिनिधियों के अलावा पाकिस्तान और कतर के अधिकारी भी मौजूद रहेंगे। हालांकि बैठक के विस्तृत कार्यक्रम और एजेंडे को सार्वजनिक नहीं किया गया है।

न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, समझौते की घोषणा के बाद वैश्विक बाजारों ने सकारात्मक प्रतिक्रिया दी। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें करीब दो प्रतिशत गिरकर तीन महीने के निचले स्तर 78 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गईं, जबकि प्रमुख शेयर बाजारों में तेजी दर्ज की गई। इसके साथ ही स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जहाजों की आवाजाही भी तेज हो गई है।

ईरान युद्ध के बाद पहली बार सऊदी अरब के तीन सुपरटैंकर होर्मुज जलडमरूमध्य से बाहर निकले हैं। इसके अलावा कई अन्य जहाजों के भी इस मार्ग से गुजरने की सूचना है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि समुद्री यातायात को पूरी तरह सामान्य होने में लगभग एक माह और तेल उत्पादन को पुराने स्तर पर लौटने में अक्टूबर तक का समय लग सकता है। इसके बावजूद जल्द ही कच्चे तेल की कीमतें 60 डॉलर प्रति बैरल तक आने की संभावना जताई जा रही है।

शिपिंग कंपनियों के अनुसार 16 से 18 जून के बीच 40 से 50 जहाज होर्मुज के पश्चिमी हिस्से से बाहर निकले हैं। वहीं अमेरिकी सेंट्रल कमांड (सेंटकॉम) ने एक्स पर जानकारी दी कि ईरानी बंदरगाहों से नाकेबंदी पूरी तरह हटा ली गई है।

एपी के मुताबिक, व्हाइट हाउस में प्रेस ब्रीफिंग के दौरान जेडी वेंस ने कहा कि अमेरिकी नौसेना ने अपनी नाकेबंदी समाप्त कर दी है और दर्जनों जहाजों को ईरानी बंदरगाहों से गुजरने की अनुमति दे दी गई है। उन्होंने बताया कि गुरुवार को 1.25 करोड़ बैरल तेल होर्मुज स्ट्रेट से होकर गुजरा।

वेंस ने कहा कि अमेरिका में गैस की कीमतें घटकर युद्ध से पहले के स्तर, यानी 4 डॉलर प्रति गैलन से नीचे आ गई हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि ईरान समझौते का सम्मान कर रहा है और लगातार दूसरे दिन उसने होर्मुज स्ट्रेट में किसी भी जहाज को निशाना नहीं बनाया।

रॉयटर्स के अनुसार, 14 बिंदुओं वाले प्रारंभिक मसौदे में 60 दिनों के युद्धविराम पर सहमति बनी है। इस दौरान ईरान के परमाणु कार्यक्रम, संवर्धित यूरेनियम और अन्य विवादित मुद्दों पर विस्तृत बातचीत की जाएगी।

एमओयू के तहत अगले 60 दिनों तक ईरान जहाजों के आवागमन पर कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं लगाएगा। हालांकि ईरान ने स्पष्ट किया है कि उसे सेवा शुल्क लेने का अधिकार बना रहेगा। इसके अलावा विदेशों में फ्रीज की गई ईरानी संपत्तियों और धनराशि को चरणबद्ध तरीके से जारी करने पर भी सहमति बनी है।

समझौते के तहत ईरान के विकास और पुनर्निर्माण के लिए अमेरिका समर्थित 300 अरब डॉलर के आर्थिक कार्यक्रम का भी प्रस्ताव रखा गया है। साथ ही ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम में यथास्थिति बनाए रखेगा तथा उच्च संवर्धित यूरेनियम को अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की निगरानी में कम संवर्धित करने और उसके निपटान पर चर्चा होगी।

इस समझौते के साथ वर्साय पैलेस एक बार फिर इतिहास के केंद्र में आ गया है। एएनआई के अनुसार, इसी महल में 1919 में प्रथम विश्व युद्ध को समाप्त करने वाली वर्साय संधि पर हस्ताक्षर हुए थे। संयोग से 107 वर्ष बाद इसी स्थान पर ट्रंप ने ईरान के साथ समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं।

एक अन्य रोचक संयोग यह है कि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव के 107 दिनों बाद यह समझौता सामने आया है। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद पहली बार दोनों देशों के बीच इस स्तर की प्रत्यक्ष वार्ता हो रही है। संघर्ष के दौरान लगभग 7,000 लोगों की मौत होने का दावा किया गया है।

ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्ला मोजतबा खामेनेई ने कहा है कि उन्होंने अपनी व्यक्तिगत आपत्तियों के बावजूद अमेरिका के साथ हुए प्रारंभिक समझौता मसौदे को मंजूरी दी। उनके अनुसार राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों ने भरोसा दिलाया कि समझौते में ईरान के अधिकारों और ‘रेजिस्टेंस फ्रंट’ के हितों की रक्षा की जाएगी।

खामेनेई ने यह भी कहा कि पेजेश्कियान ने आश्वासन दिया है कि यदि अमेरिका तय शर्तों से आगे बढ़कर कोई अतिरिक्त मांग करता है तो ईरान उसके आगे नहीं झुकेगा। उन्होंने दोहराया कि अमेरिका के साथ सीधी वार्ता का मतलब उसके रुख को स्वीकार करना नहीं है।

इस बीच अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने ईरान युद्ध के दौरान अमेरिका का साथ न देने के लिए नाटो देशों की आलोचना की है। उन्होंने कहा कि अमेरिका के बिना नाटो एक “कागजी शेर” है। सहयोगी देशों के इसी रवैये के कारण अमेरिका ने यूरोप में तैनात अपने सैनिकों की संख्या कम करने का निर्णय लिया है।

हेगसेथ ने पोलैंड को अमेरिका का नया प्रमुख सैन्य केंद्र बनाने के संकेत भी दिए हैं। वर्तमान में अमेरिका का मुख्य सैन्य ठिकाना जर्मनी में स्थित है। ब्रसेल्स स्थित नाटो मुख्यालय में रक्षा मंत्रियों की बैठक के दौरान उन्होंने कहा कि ईरान युद्ध के समय सहयोगी देशों का रवैया निराशाजनक रहा और यह एकतरफा व्यवस्था ज्यादा समय तक नहीं चल सकती।

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