इस साल 28 फरवरी को अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच भड़के भीषण युद्ध के बाद बंद हुए ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ (Strait of Hormuz) को लेकर एक बड़ी और सकारात्मक खबर सामने आई है। पिछले कई महीनों से जारी वैश्विक तनाव और आर्थिक अनिश्चितता के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा घोषित एक ऐतिहासिक समझौते ने दुनिया को राहत की बड़ी उम्मीद दी है। राष्ट्रपति ट्रंप ने सोशल मीडिया पर इस सफलता का ऐलान करते हुए लिखा, “दुनिया के जहाजों अपने इंजन चालू करो। तेल को बहने दो!”
आगामी शुक्रवार को स्विट्जरलैंड के जिनेवा में अमेरिका और ईरान के बीच इस शांति समझौते पर औपचारिक रूप से दस्तखत किए जाएंगे। इसके तुरंत बाद होर्मुज स्ट्रेट को जहाजों की आवाजाही के लिए खोल दिया जाएगा। चूंकि दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत कच्चा तेल इसी संकरे समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है, इसलिए इसे खोलने के दूरगामी और व्यापक आर्थिक नतीजे होंगे। हालांकि, रक्षा और बाजार विश्लेषकों का कहना है कि भले ही होर्मुज खुल जाएगा और तेल की सप्लाई तत्काल चालू हो जाएगी, लेकिन वैश्विक सप्लाई चेन और हालात को पूरी तरह सामान्य होने में अगले साल (2027) तक का समय लग सकता है।
वैश्विक सप्लाई चेन पर पड़ा था भारी असर
युद्ध के दौरान होर्मुज स्ट्रेट बंद होने के कारण पूरी दुनिया में ऊर्जा संकट खड़ा हो गया था। एशिया में फिलीपींस जैसे देशों को राष्ट्रीय ऊर्जा आपातकाल की घोषणा करनी पड़ी थी, जबकि जापान और दक्षिण कोरिया ने स्थिति को संभालने के लिए अपने रणनीतिक आपातकालीन तेल भंडार का इस्तेमाल किया। वहीं, पश्चिमी देशों में आम जनता को फ्यूल स्टेशनों पर ईंधन की किल्लत और हवाई यात्रा के बेहद महंगे किराए के रूप में इसकी सीधी मार झेलनी पड़ी।
इस ऐतिहासिक समझौते की घोषणा होते ही वैश्विक बाजारों ने सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है। ग्लोबल ऑयल बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड की कीमत 4.55 प्रतिशत गिरकर 83.36 डॉलर प्रति बैरल पर आ गई है, जिससे एशियाई शेयर बाजारों में बड़ी तेजी देखी गई है। होर्मुज स्ट्रेट खुलने और समुद्र से बारूदी सुरंगें हटाने का काम पूरा होते ही फारस की खाड़ी में फंसे सैकड़ों तेल, गैस और ईंधन टैंकर एशियाई बंदरगाहों के लिए रवाना हो सकेंगे। इससे सऊदी अरब, इराक, यूएई, कुवैत और कतर जैसे बड़े उत्पादकों की रुकी हुई सप्लाई चेन फिर से बहाल हो जाएगी।
खाद्य सुरक्षा और गैस बाजार को संजीवनी
ईंधन के साथ-साथ इस मार्ग के खुलने से ईरान, सऊदी अरब और ओमान जैसे मुख्य उत्पादकों से फर्टिलाइजर (खाद) की सप्लाई भी दोबारा शुरू होगी। इसके अलावा, कुकिंग गैस (LPG) और खाद्य पैकेजिंग में इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक रैप के निर्माण के लिए जरूरी कच्चा माल ‘नेफ्था’ भी बाजारों में पहुंचने लगेगा। खादों की कमी के कारण एशिया में मई-जुलाई के बुवाई के मौसम पर पहले ही बुरा असर पड़ चुका है। एशियन डेवलपमेंट बैंक (ADB) के चीफ इकोनॉमिस्ट अल्बर्ट पार्क के अनुसार, “उत्पादन में आई इस कमी का सबसे बुरा असर शायद इस साल के आखिर में देखने को मिलेगा।”
इसके अतिरिक्त, लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) की कीमतों में भी आने वाले महीनों में गिरावट आने की उम्मीद है। चूंकि एलएनजी की कीमतें तेल की कीमतों से जुड़ी होती हैं और इनमें असर दिखने में 3 से 6 महीने की देरी होती है, इसलिए ईंधन की कीमतें घटने के कुछ महीनों बाद इस साल के अंत तक एलएनजी भी सस्ती हो जाएगी।
पूरी तरह सामान्य होने में लगेंगे कई महीने
विशेषज्ञों का मानना है कि 100 से ज्यादा दिनों तक चली इस लड़ाई से पैदा हुई आर्थिक दिक्कतों को कम समय में पूरी तरह ठीक नहीं किया जा सकेगा। टफ्ट्स यूनिवर्सिटी के फ्लेचर स्कूल में समुद्री अध्ययन के प्रोफेसर रॉकफोर्ड वेट्ज ने बताया कि होर्मुज स्ट्रेट में समुद्री ट्रैफिक को युद्ध से पहले के स्तर पर लौटने में महीनों लग सकते हैं। शिपिंग इंडस्ट्री सुरक्षा कारणों से शुरू में इस रास्ते पर उतरने में थोड़ी हिचकिचाहट दिखाएगी। साथ ही, कतर, सऊदी अरब और कुवैत समेत कई खाड़ी देशों में तेल और गैस के प्रोडक्शन प्लांट्स को युद्ध के कारण नुकसान पहुंचा है, जिन्हें पूरी तरह ठीक होने में समय लगेगा। जापान की एजेंसी फॉर नेचुरल रिसोर्सेज एंड एनर्जी के सलाहकार हारुहिको सकाइनो ने इसकी तुलना क्षतिग्रस्त महीन नसों (कैपिलरीज) से करते हुए कहा कि आयात फिर से शुरू करना उतना आसान नहीं होगा, व्यवस्था को सुधरने में समय लगेगा।
भारत के लिए बड़ी कूटनीतिक और आर्थिक जीत
दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल आयातकों में से एक होने के नाते, भारत के लिए होर्मुज स्ट्रेट का खुलना किसी वरदान से कम नहीं है। इससे देश में तेल की सप्लाई सुचारू होगी, माल ढुलाई (फ्रेट रेट्स) की लागत घटेगी और घरेलू बाजार पर बना महंगाई का दबाव कम होगा। सऊदी अरब, इराक और यूएई जैसे मुख्य सप्लायर्स से भारत को तेल मिलना आसान हो जाएगा, जिससे शिपिंग इंश्योरेंस प्रीमियम में भी कमी आएगी।
उद्योग जगत के सूत्रों के मुताबिक, युद्ध के दौरान भारतीय सरकारी तेल कंपनियों को महज एक तिमाही में इतना भारी नुकसान हुआ था, जो उनकी साल भर की कमाई के बराबर था। अब तेल की कीमतें लगातार गिरने से भारत का इंपोर्ट बिल कम होगा, रुपये को मजबूती मिलेगी, करंट अकाउंट घाटा (CAD) घटेगा और महंगाई पर लगाम लगेगी। ईंधन सस्ता होने से देश में ट्रांसपोर्टेशन का खर्च कम होगा, जिससे खाने-पीने की चीजों से लेकर कंस्ट्रक्शन मटीरियल तक के दाम काबू में आएंगे। इसका सीधा फायदा भारत के एविएशन, पेट्रोकेमिकल्स, फर्टिलाइजर और लॉजिस्टिक्स जैसे प्रमुख सेक्टर्स को मिलेगा।
भू-राजनीतिक स्थिरता पर टिकी उम्मीदें:
यह पूरा सकारात्मक परिदृश्य इस उम्मीद के साथ देखा जा रहा है कि क्षेत्र में भू-राजनीतिक (जियोपॉलिटिकल) स्थिरता बनी रहेगी। जब तक जहाज होर्मुज से निकलकर अपनी मंजिलों तक नहीं पहुंचते, तब तक कई महीने लग सकते हैं। जानकारों ने चेतावनी दी है कि यदि मध्य पूर्व (मिडल ईस्ट) में यह सैन्य संघर्ष दोबारा भड़क उठता है, तो पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था फिर से उसी संकट में फंस जाएगी जहां से यह शुरू हुई थी।
