वॉशिंगटन: पेंटागन जर्मनी को लंबी दूरी की टोमाहॉक (Tomahawk) क्रूज मिसाइलें सौंपने की अपनी योजना को रद्द करने पर विचार कर रहा है। खुफिया और कूटनीतिक रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिकी अधिकारियों को डर है कि इस मिसाइल सौदे को रूस सीधे उकसावे के रूप में देख सकता है, जिससे यूरोप में एक बड़ा और अनियंत्रित सैन्य टकराव शुरू होने का खतरा है।
यह संभावित फैसला वॉशिंगटन के भरोसेमंद नाटो सहयोगी जर्मनी के लिए हैरान करने वाला है। इसे अमेरिका द्वारा अपने पुराने सहयोगियों से पीछे हटने के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। गौरतलब है कि यह समझौता बाइडन प्रशासन के दौरान तय किया गया था, जिसे अब डोनाल्ड ट्रंप पलटने की तैयारी में दिख रहे हैं। जर्मनी का नेतृत्व लगातार यह दलील देता रहा है कि रूसी आक्रामकता से निपटने के लिए उसे इन आधुनिक रक्षा प्रणालियों की सख्त जरूरत है। वॉशिंगटन में इस समय इस विषय पर तीव्र आंतरिक मंथन चल रहा है।
अमेरिकी रणनीतिकारों का मानना है कि जर्मनी में इन मिसाइलों की तैनाती से मॉस्को भड़क सकता है और सैन्य जवाब दे सकता है। वर्तमान अमेरिकी प्रशासन रूस के साथ सीधे सैन्य गतिरोध से बचना चाहता है, भले ही इसके लिए उसे सहयोगियों की सुरक्षा प्राथमिकताओं से समझौता करना पड़े। दूसरी ओर, बर्लिन में इसे लेकर भारी बेचैनी है क्योंकि जर्मनी की भावी रक्षा रणनीति इसी सौदे पर टिकी थी।
यह कवायद यूरोप और नाटो के प्रति अमेरिकी नीति में आ रहे गहरे बदलाव का हिस्सा है। अमेरिका धीरे-धीरे यूरोपीय सुरक्षा में अपनी भागीदारी कम कर रहा है। इसमें मिसाइल सौदों को वापस लेना और जर्मनी में तैनात सैनिकों व सैन्य संपत्तियों को वापस बुलाने की योजनाएं शामिल हैं। नाटो के शीर्ष कमांडर जनरल एलेक्सस ग्रिनकेविच ने भी स्पष्ट किया है कि अब यूरोप को अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी खुद संभालनी होगी। उन्होंने कहा कि अमेरिका अब अपनी सेनाओं और हथियारों को यूरोप से हटाकर इंडो-पैसिफिक जैसे अन्य संघर्ष क्षेत्रों पर केंद्रित करने जा रहा है।
टोमाहॉक मिसाइल सौदे का रद्द होना जर्मनी की सुरक्षा के लिए बड़ा संकट पैदा कर सकता है। यूक्रेन युद्ध के बाद से ही जर्मनी में इस बात का डर है कि रूस को रोकने के लिए उनके पास पर्याप्त हथियार प्रणाली नहीं है। विशेषज्ञों का कहना है कि जर्मनी के पास फिलहाल ऐसी कोई घरेलू तकनीक नहीं है जो टोमाहॉक की जगह ले सके और इसे विकसित करने में दशकों लग सकते हैं।
इस फैसले के पीछे रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की संभावित प्रतिक्रिया का डर सबसे बड़ा कारण बताया जा रहा है। रूस पहले ही चेतावनी दे चुका है कि नाटो की ऐसी किसी भी तैनाती का जवाब वह अपनी मिसाइलों का रुख यूरोप के शहरों की तरफ करके देगा। ट्रंप प्रशासन की नई कूटनीति सैन्य टकराव टालने और अमेरिकी सैन्य भागीदारी को सीमित करने पर केंद्रित है। हालांकि, इस रुख से नाटो के भीतर अमेरिका की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं। पोलैंड और बाल्टिक देशों जैसे छोटे सहयोगियों में भी अपनी सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई है। कुल मिलाकर, यह घटनाक्रम इस बात का संकेत है कि ट्रांस-अटलांटिक सुरक्षा की पुरानी कड़ियां कमजोर हो रही हैं और यूरोप को अब सुरक्षा के लिए आत्मनिर्भर होना होगा।
