ट्रंप का नया टैरिफ दांव: भारत समेत कई देशों के आयात पर 12.5% शुल्क का प्रस्ताव

अमेरिका ने भारत सहित अपने कई प्रमुख व्यापारिक साझेदार देशों से आयात होने वाले उत्पादों पर नए टैरिफ लगाने का प्रस्ताव रखा है। यह कदम ऐसे समय सामने आया है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की व्यापक टैरिफ नीति को अदालत से झटका लग चुका है और प्रशासन वैकल्पिक रास्तों की तलाश कर रहा है।

टैरिफ को लेकर अमेरिकी कोर्ट से मात खाने के बाद अब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक नया पैंतरा आजमाया है। इस बार अमेरिकी प्रशासन की ओर से जबरन मजदूरी (बंधुआ मजदूरी) को बहाना बनाया गया है। अमेरिका ने भारत समेत दुनिया के कई बड़े ट्रेडिंग पार्टनर देशों से आयात होने वाले उत्पादों पर नए टैरिफ लगाने का प्रस्ताव रख दिया है। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय (USTR) की ओर से जारी आधिकारिक बयान के अनुसार, भारत से आने वाले सामान पर 12.5 प्रतिशत तक का नया टैरिफ लगाया जा सकता है।

अमेरिका का तर्क है कि भारत अपने यहां जबरन काम करवाने यानी बंधुआ मजदूरी पर सख्ती से रोक लगाए। अमेरिकी प्रशासन ने चेतावनी दी है कि अगर ऐसा नहीं हुआ तो अमेरिकी कानून के तहत ऐसे माल पर पूरी तरह बैन भी लग सकता है। गौरतलब है कि ट्रंप सरकार ने भारत के स्टील और एल्युमीनियम जैसे उत्पादों पर जो भारी टैक्स लगाया था, द्विपक्षीय ट्रेड डील के तहत भारत उसे हटवाना चाहता है ताकि भारतीय कंपनियों को अमेरिकी बाजार में बराबरी का मौका मिल सके। लेकिन इस नए प्रस्ताव ने भारत की चिंताओं को दोबारा बढ़ा दिया है।

किन देशों पर कितना टैरिफ प्रस्तावित?

लाइव मिंट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका ने अलग-अलग देशों के लिए दो श्रेणियों में टैरिफ का प्रस्ताव रखा है:

  • 10 प्रतिशत टैरिफ: कनाडा, मैक्सिको, यूरोपीय संघ (EU), ब्रिटेन और ताइवान जैसे देशों से आयात होने वाले उत्पादों पर न्यूनतम 10 प्रतिशत टैरिफ प्रस्तावित है।
  • 12.5 प्रतिशत टैरिफ: भारत, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, ब्राजील और स्विट्जरलैंड जैसे देशों से आने वाले सामान के लिए 12.5 प्रतिशत शुल्क का प्रस्ताव रखा गया है।

अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जैमिसन ग्रीर ने इस कदम को जायज ठहराते हुए कहा कि कई बड़े ट्रेडिंग पार्टनर जबरन श्रम से बने उत्पादों के आयात को रोकने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं कर रहे हैं। उन्होंने साफ किया कि यह स्थिति अमेरिकी मजदूरों के लिए बाजार में एक असमान प्रतिस्पर्धा पैदा करती है और अब अमेरिका इस अंतर को और ज्यादा बर्दाश्त नहीं करेगा। ग्रीर के अनुसार, कुछ देशों ने इस दिशा में शुरुआती कदम जरूर उठाए हैं, लेकिन सभी ट्रेडिंग पार्टनर्स को अब यह सुनिश्चित करना ही होगा कि ग्लोबल ट्रेड के जरिए जबरन मजदूरी को बढ़ावा न मिले।

भारतीय एक्सपोर्टर्स पर क्या होगा असर?

अगर अमेरिका का यह नया प्रस्ताव लागू होता है, तो भारतीय निर्यातकों (Exporters) के लिए अमेरिकी बाजार में बने रहना और मुकाबला करना काफी महंगा हो जाएगा। इसका सीधा और सबसे बड़ा असर भारत के इंजीनियरिंग सामान, टेक्सटाइल (कपड़ा उद्योग), रसायन (Chemicals), फार्मा (दवाइयां) और अन्य प्रमुख एक्सपोर्ट सेक्टर्स पर पड़ सकता है। हालांकि, राहत की बात यह है कि यह कदम अभी केवल प्रस्तावित है और इस पर अंतिम फैसला सार्वजनिक सलाह और कानूनी सुनवाई के बाद ही लिया जाएगा।

अमेरिकी प्रशासन ने इस पूरे प्रस्ताव पर आगामी 6 जुलाई तक लिखित सुझाव और आपत्तियां मांगी हैं। इसके ठीक बाद, 7 जुलाई से ‘सेक्शन 301 पैनल’ इस मामले पर सार्वजनिक सुनवाई शुरू करेगा। इन सुनवाइयों से निकलने वाले निष्कर्षों के आधार पर ही आगे की अंतिम कार्रवाई तय की जाएगी।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद चुना सेक्शन 301 का रास्ता

दरअसल, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले भी व्यापक स्तर पर टैरिफ लगाने की कोशिश कर चुके हैं, लेकिन इसी साल फरवरी में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने आपातकालीन शक्तियों के तहत लगाए गए उनके कुछ शुल्कों को अवैध बताते हुए रद्द कर दिया था। कोर्ट से मिले इस झटके के बाद ट्रंप प्रशासन ने अब ‘सेक्शन 301 जांच’ का सहारा लिया है, जिसे कानूनी रूप से कोर्ट में अधिक मजबूत माना जाता है। फिलहाल अमेरिका ने ‘सेक्शन 122’ के तहत 10 प्रतिशत का एक अस्थायी वैश्विक शुल्क भी लागू कर रखा है, जिसकी समय सीमा इसी साल जुलाई में समाप्त हो रही है।

बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ये नए टैरिफ पूरी तरह लागू हो जाते हैं, तो अमेरिका और उसके प्रमुख व्यापारिक साझेदार देशों के बीच वैश्विक स्तर पर तनाव काफी बढ़ सकता है। हालांकि, इस नए संकट के बावजूद अभी तक अधिकांश प्रभावित देशों ने पलटवार या जवाबी कार्रवाई करने के बजाय, बातचीत और आपसी ट्रेड डील के जरिए ही इस समस्या का शांतिपूर्ण समाधान तलाशने की रणनीति अपनाई है।

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