नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह द्वारा भारत और नेपाल के बीच सीमा विवाद को लेकर दिए गए एक बयान पर देश के भीतर राजनीतिक घमासान चरम पर पहुंच गया है। प्रधानमंत्री के इस दावे के बाद कि न केवल भारत ने बल्कि नेपाल ने भी कई जगहों पर भारत की जमीन पर कब्जा कर रखा है, विपक्षी दल पूरी तरह लामबंद होकर सड़कों और संसद में उतर आए हैं। विपक्ष की एक ही मुख्य मांग है कि प्रधानमंत्री अपने इस गैर-जिम्मेदाराना बयान के लिए संसद में आकर देश से माफी मांगें।
गौरतलब है कि नेपाल और भारत के बीच लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी जैसे तीन प्रमुख इलाकों को लेकर कई दशकों पुराना और बेहद संवेदनशील सीमा विवाद चला आ रहा है, जहाँ दोनों देश इन भूभागों पर अपना-अपना संप्रभु दावा पेश करते हैं। ऐसे संवेदनशील माहौल में प्रधानमंत्री के इस कबूलनामे ने पूरे देश में एक नया राजनीतिक भूचाल ला दिया है।
इस विवाद की सीधी गूंज सोमवार को संसद के दोनों सदनों में देखने को मिली, जहाँ नेशनल असेंबली (ऊपरी सदन) की बैठक शुरू होते ही विपक्षी सांसदों ने खड़े होकर जोरदार हंगामा और विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया। विपक्ष के भारी शोर-शराबे और रविवार के बयान पर माफी की जिद के आगे सदन की कार्यवाही पूरी तरह ठप हो गई।
नेशनल असेंबली के अध्यक्ष नारायण प्रसाद दहल ने स्थिति को संभालने के लिए पहले बैठक को बीस मिनट के लिए रोका, लेकिन जब दोबारा सदन की कार्यवाही शुरू हुई तो हंगामा थमा नहीं, जिसके कारण आखिरकार बैठक को मंगलवार दोपहर सवा एक बजे तक के लिए स्थगित करना पड़ा।
लगभग ऐसा ही नजारा निचले सदन यानी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में भी देखने को मिला, जहाँ स्पीकर डोल प्रसाद अर्याल ने विपक्षी सांसदों से सदन को सुचारू रूप से चलने देने की बार-बार भावुक अपील की, लेकिन गुस्से से लाल विपक्ष टस से मस नहीं हुआ।
इस पूरे फसाद की जड़ रविवार को हुई संसद की वह बैठक है, जिसमें सांसद प्रधानमंत्री बालेन शाह से लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी विवाद पर सरकार का रुख स्पष्ट करने के लिए सवाल पूछ रहे थे। इन सवालों का जवाब देते हुए प्रधानमंत्री ने कुछ ऐसा कह दिया जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि आपको यह जानकर हैरानी होगी, लेकिन मुझे भी देश का प्रधानमंत्री बनने के बाद ही यह आधिकारिक तौर पर पता चला कि सिर्फ भारत ने ही नेपाल की जमीन नहीं दबाई है, बल्कि नेपाल ने भी कई जगहों पर भारत की जमीन पर अवैध कब्जा कर रखा है। प्रधानमंत्री का यह बयान आते ही संसद में सन्नाटा खिंच गया और तुरंत ही इसे एक बड़े राष्ट्रविरोधी बयान के रूप में देखा जाने लगा।
नेपाल की राजनीति और समाज में सीमा का यह मुद्दा बेहद भावनात्मक और राष्ट्रीय सम्मान से गहराई से जुड़ा हुआ माना जाता है, जहाँ वहां के आम नागरिक और नेता हमेशा से भारत पर अपनी जमीन दबाने का आरोप लगाते रहे हैं। ऐसे में खुद देश के प्रधानमंत्री द्वारा नेपाल को भी अतिक्रमणकारी के रूप में पेश करने से विपक्ष को सरकार को घेरने का एक बड़ा मुद्दा मिल गया है।
इस बयान की न केवल नेताओं ने बल्कि पूर्व राजनयिकों और सीमा विशेषज्ञों ने भी कड़ी आलोचना की है। विशेषज्ञों का तर्क है कि यदि सीमावर्ती इलाकों में किसान खेती के लिए अनजाने में सीमा पार की जमीन का इस्तेमाल करते हैं, तो उसे किसी भी स्थिति में देश द्वारा किया गया ‘सरकारी कब्जा’ नहीं कहा जा सकता और प्रधानमंत्री शाह ने दोनों अलग-अलग मामलों को एक ही तराजू पर तौलकर बड़ी गलती की है।
फिलहाल विपक्षी नेताओं ने सरकार को दोटूक चेतावनी दी है कि जब तक प्रधानमंत्री स्वयं संसद के पटल पर आकर अपना रुख पूरी तरह साफ नहीं करते और देश से माफी नहीं मांगते, तब तक संसद के दोनों सदनों को किसी भी कीमत पर चलने नहीं दिया जाएगा।
नेपाली कांग्रेस के शीर्ष नेताओं का कहना है कि यह देश की संप्रभुता से जुड़ा बेहद गंभीर मामला है और इसका तत्काल समाधान होना चाहिए। इस बीच, राजनीतिक सरगर्मियों के दौरान प्रतिनिधि सभा की बैठक में कुछ सांसदों द्वारा किए गए कथित अनुचित और अमर्यादित व्यवहार की जांच के लिए एक विशेष संसदीय जांच समिति का भी गठन कर दिया गया है, जिसे सात दिनों के भीतर अपनी जांच रिपोर्ट स्पीकर को सौंपनी होगी ताकि आगे की दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित की जा सके।
