अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते की चर्चाओं के बीच ईरान इसे अपनी रणनीतिक और राजनीतिक जीत के तौर पर पेश करने में जुट गया है। ईरानी नेतृत्व और सरकारी मीडिया लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि भारी सैन्य और आर्थिक दबाव के बावजूद तेहरान नेअमेरिका और इज़राइल के सामने झुकने के बजाय बातचीत का रास्ता अपनाने के लिए उन्हें मजबूर किया।
ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर प्राचीन फारसी साम्राज्य का जिक्र करते हुए कहा कि जैसे कभी रोमन साम्राज्य की अजेयता का भ्रम टूटा था, उसी तरह आज ईरान ने ताकतवर देशों के सामने झुकने से इनकार किया है। उनके इस बयान को मौजूदा अमेरिका-ईरान वार्ता से जोड़कर देखा जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक समझौते का अंतिम स्वरूप सामने नहीं आता, तब तक यह तय करना मुश्किल होगा कि वास्तविक लाभ किसे मिलेगा। हालांकि, ईरान के पास इसे घरेलू राजनीति और क्षेत्रीय प्रभाव के लिहाज से बड़ी जीत के रूप में पेश करने का पर्याप्त अवसर मौजूद है।
In the Roman mind, Rome was the undisputed center of the world. Yet the Iranians shattered that illusion; when Marcus Julius Philippus (Philip the Arab) marched east against Persia, the campaign did not result in Roman victory — it ended in a peace established on Sasanian terms:… pic.twitter.com/hLSqAUzb7p
— Esmaeil Baqaei (@IRIMFA_SPOX) May 23, 2026
‘यूरोपियन काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस’ की विश्लेषक एली गेरानमायेह के मुताबिक, कुछ महीने पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप “बिना शर्त आत्मसमर्पण” की बात कर रहे थे, लेकिन अब अमेरिका को बातचीत के जरिए समाधान तलाशना पड़ रहा है। उनके अनुसार, ईरान यह संदेश देने में सफल रहा है कि वह दो परमाणु शक्तियों — अमेरिका और इजरायल — के दबाव का सामना कर सकता है।
विश्लेषकों के अनुसार, ईरान खुद को मजबूत स्थिति में इसलिए भी मान रहा है क्योंकि उसने होर्मुज जलडमरूमध्य पर अपनी पकड़ और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को प्रभावित करने की क्षमता का प्रदर्शन किया। इसके अलावा, अमेरिका और इजरायल के कई बड़े रणनीतिक लक्ष्य भी पूरी तरह सफल नहीं हो सके।
रिपोर्टों के मुताबिक, ईरान के शीर्ष सैन्य नेताओं और सर्वोच्च नेतृत्व को निशाना बनाए जाने के बावजूद वहां की सत्ता व्यवस्था कायम रही। वहीं, संभावित समझौते में फिलहाल ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम या उसके समर्थित सशस्त्र गुटों पर किसी बड़े प्रतिबंध या शर्त का स्पष्ट उल्लेख सामने नहीं आया है।
हालांकि, ईरान की स्थिति पूरी तरह मजबूत भी नहीं मानी जा रही। लंबे समय से जारी प्रतिबंधों और संघर्ष के कारण देश गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रहा है। स्टील, पेट्रोकेमिकल और अन्य प्रमुख उद्योगों को भारी नुकसान पहुंचा है। ऐसे में यदि किसी समझौते के तहत ईरान को तेल निर्यात में राहत मिलती है या विदेशों में जमा उसके आर्थिक फंड तक पहुंच बहाल होती है, तो तेहरान इसे घरेलू स्तर पर बड़ी कूटनीतिक सफलता के रूप में पेश कर सकता है।
