Chaitra Navratri 2026: चैत्र नवरात्रि अपने अंतिम पड़ाव की ओर है और भक्तों के बीच इस समय सबसे बड़ी जिज्ञासा महाष्टमी और महानवमी की तिथियों को लेकर है। हिन्दू धर्म में इन दो दिनों का विशेष महत्व है, क्योंकि इनके बिना नौ दिनों की साधना अधूरी मानी जाती है। ज्योतिषाचार्य पं. राकेश झा के अनुसार, इस वर्ष तिथियों के घटने-बढ़ने के कारण कन्या पूजन के समय का विशेष ध्यान रखना होगा। मान्यता है कि कन्याओं को साक्षात मां दुर्गा का स्वरूप मानकर भोजन कराने से घर में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है और व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है।
अष्टमी तिथि और कन्या पूजन का समय
पंचांग की गणना के मुताबिक, चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि का प्रारंभ 25 मार्च 2026 को दोपहर 1 बजकर 51 मिनट पर होगा। इस तिथि का समापन अगले दिन 26 मार्च 2026, गुरुवार को सुबह 11 बजकर 49 मिनट पर होगा। उदया तिथि के सिद्धांत के अनुसार, महाष्टमी का व्रत और पूजन 26 मार्च को ही किया जाएगा। जो श्रद्धालु अष्टमी के दिन कन्या पूजन करते हैं, उन्हें विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए कि वे सुबह 11 बजकर 49 मिनट से पहले अपना पूजन संपन्न कर लें, क्योंकि इसके बाद नवमी तिथि लग जाएगी।
महानवमी और व्रत पारण की जानकारी
वहीं, नवमी तिथि का आगाज़ 26 मार्च को सुबह 11 बजकर 50 मिनट पर होगा और यह 27 मार्च 2026, शुक्रवार को सुबह 10 बजकर 08 मिनट तक रहेगी। शास्त्रों के अनुसार सूर्योदय व्यापिनी तिथि को ही प्रधान माना जाता है, इसलिए महानवमी का पर्व और कन्या पूजन 27 मार्च को मनाया जाएगा। जो भक्त पूरे नौ दिनों का व्रत रखकर नवमी को उद्यापन करते हैं, उनके लिए शुभ मुहूर्त सुबह 10 बजकर 08 मिनट तक ही है। इसके पश्चात दशमी तिथि शुरू हो जाएगी, इसलिए समय रहते पूजन करना श्रेयस्कर रहेगा।
कन्या पूजन का महत्व और विधि
नवरात्रि में कन्या पूजन केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि नारी शक्ति के प्रति सम्मान प्रकट करने का माध्यम है। इस दिन 2 से 10 वर्ष तक की आयु की कन्याओं को आमंत्रित किया जाता है। पूजन की विधि के अनुसार, सबसे पहले कन्याओं के पैर धोकर उन्हें साफ आसन पर बैठाया जाता है। इसके बाद उन्हें कुमकुम का तिलक लगाकर हाथ में कलावा बांधा जाता है। भोजन में मुख्य रूप से हलवा, पूरी और काले चने का प्रसाद परोसा जाता है। अंत में सामर्थ्य अनुसार उपहार या दक्षिणा देकर उनके पैर छूकर आशीर्वाद लिया जाता है। धार्मिक दृष्टि से यह माना जाता है कि ऐसा करने से मां दुर्गा अत्यंत प्रसन्न होती हैं और साधक की सभी मनोकामनाएं पूरी करती हैं।
