Jagannath Rath Yatra 2026: भारत के सबसे वैभवशाली और प्रसिद्ध धार्मिक उत्सवों में से एक ‘जगन्नाथ रथ यात्रा’ की तैयारियां ओडिशा के पुरी शहर में शुरू हो चुकी हैं। भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा देवी को समर्पित यह महान उत्सव दुनिया की सबसे बड़ी धार्मिक यात्राओं में गिना जाता है। इसे रथ यात्रा या ‘श्री गुंडिचा यात्रा’ के नाम से भी जाना जाता है। हर साल लाखों की संख्या में श्रद्धालु देश-विदेश से पुरी पहुंचते हैं ताकि वे उन विशालकाय लकड़ी के रथों की रस्सी को छू सकें, जिनमें सवार होकर भगवान अपने भक्तों को दर्शन देने मंदिर से बाहर निकलते हैं।
जगन्नाथ रथ यात्रा 2026: महत्वपूर्ण तिथियां और मुहूर्त
हिंदू पंचांग के अनुसार, यह यात्रा हर साल आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को निकाली जाती है। वर्ष 2026 में जगन्नाथ रथ यात्रा 16 जुलाई, गुरुवार को आयोजित की जाएगी। धार्मिक गणना के अनुसार, द्वितीया तिथि का प्रारंभ 15 जुलाई 2026 को सुबह 11:50 बजे होगा और इसका समापन 16 जुलाई 2026 को सुबह 08:52 बजे होगा। उदया तिथि के मान के अनुसार 16 जुलाई को ही मुख्य रथ यात्रा निकाली जाएगी। वहीं, भगवान की वापसी की यात्रा, जिसे ‘बहुदा यात्रा’ कहा जाता है, 24 जुलाई 2026, शुक्रवार को संपन्न होगी।

रथ यात्रा की अनूठी परंपराएं और छेर पहनरा
जगन्नाथ रथ यात्रा की सबसे अनूठी विशेषता इसके तीन अलग-अलग रथ हैं, जिन्हें नीम की लकड़ी से विशेष रूप से तैयार किया जाता है। भगवान जगन्नाथ का रथ ‘नंदीघोष’ कहलाता है, जिसमें 16 पहिये होते हैं। उनके बड़े भाई बलभद्र का रथ ‘तालध्वज’ 14 पहियों वाला होता है और बहन सुभद्रा का रथ ‘दर्पदलन’ 12 पहियों का होता है। इन रथों को खींचने के लिए भक्तों का सैलाब उमड़ता है, क्योंकि मान्यता है कि रथ खींचने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।
यात्रा शुरू होने से पहले एक बहुत ही प्रेरणादायक परंपरा निभाई जाती है, जिसे ‘छेर पहनरा’ कहते हैं। इसमें ओडिशा के गजपति राजा स्वयं आकर सोने की झाड़ू से रथों के रास्ते और रथ की सफाई करते हैं। यह रस्म समाज को संदेश देती है कि भगवान की सेवा में कोई छोटा या बड़ा नहीं होता और राजा भी भगवान के सामने एक साधारण सेवक है।
धार्मिक महत्व और पौराणिक मान्यताएं
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ अपने मंदिर से निकलकर अपनी मौसी के घर यानी गुंडिचा मंदिर जाते हैं और वहां कुछ दिन विश्राम करते हैं। स्कंद पुराण में वर्णन है कि जो व्यक्ति इस यात्रा के दौरान भक्ति भाव से भगवान के दर्शन करता है या रथ को खींचता है, उसके सभी पिछले पाप धुल जाते हैं और वह जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है। यह समय भक्तों के लिए विशेष होता है क्योंकि जो लोग मंदिर के भीतर नहीं जा सकते, भगवान स्वयं उनके द्वार तक आकर उन्हें दर्शन और आशीर्वाद देते हैं।
