ICC Men’s T20 World Cup: साउथ अफ्रीका के खिलाफ मुकाबले से पहले भारतीय कप्तान सूर्यकुमार यादव पूरे आत्मविश्वास में नजर आए थे। उन्होंने साफ कहा था कि पावरप्ले में टीम 40-50 रन आसानी से बना रही है और 240-250 के स्कोर की सोच के साथ मैदान पर उतरती है। अभिषेक शर्मा और तिलक वर्मा की फॉर्म को लेकर उठ रहे सवालों को भी उन्होंने ज्यादा तवज्जो नहीं दी थी। यहां तक कि विकेटकीपर बल्लेबाज संजू सैमसन को प्लेइंग-11 में शामिल करने की मांग को भी उन्होंने खारिज कर दिया था।
लेकिन मैच का नतीजा इस आत्मविश्वास पर भारी पड़ता दिखा। ग्रुप स्टेज में लगातार चार जीत के बाद भारतीय टीम सुपर 8 में साउथ अफ्रीका के खिलाफ असली परीक्षा में उतरी, जहां धीमी काली मिट्टी की पिच पर गेंद रुककर आ रही थी। 188 रनों के लक्ष्य का पीछा करते हुए भारतीय टीम 111 रन पर सिमट गई। आक्रामक टेम्पलेट पर अड़े रहने की जिद टीम को भारी पड़ी।
पहले ही ओवर में पार्टटाइम ऑफ स्पिनर एडेन मार्करम का शिकार बने ईशान किशन ने झटका दिया। तिलक वर्मा ने खराब फॉर्म के बीच गैर जिम्मेदाराना शॉट खेलकर विकेट गंवाया और एक रिव्यू भी बेकार किया। अभिषेक शर्मा ने 15 रन जरूर बनाए, लेकिन वह लय में नजर नहीं आए। शुरुआती झटकों के बाद भी किसी बल्लेबाज ने पारी संभालने या रणनीति बदलने की कोशिश नहीं की। ‘हर कीमत पर अटैक’ की सोच ने स्थिति और बिगाड़ दी।
विडंबना यह रही कि गेंदबाजी में जसप्रीत बुमराह की मेहनत पर पानी फिर गया। 188 रन का लक्ष्य मुश्किल जरूर था, लेकिन असंभव नहीं। इसके बावजूद कप्तान खुद 18 रन बनाकर लौटे और मिडिल ऑर्डर दबाव में बिखर गया।
टीम चयन पर भी सवाल उठ रहे हैं। परिस्थितियों को देखते हुए संतुलित संयोजन की जरूरत थी, लेकिन वॉशिंगटन सुंदर को उपकप्तान अक्षर पटेल पर तरजीह देना चौंकाने वाला फैसला रहा। इतना ही नहीं, सुंदर को इन-फॉर्म शिवम दुबे से ऊपर बल्लेबाजी के लिए भेजा गया, जो रणनीतिक रूप से समझ से परे लगा। विपक्षी गेंदबाजों ने गति और लेंथ में बदलाव किया, मगर भारतीय बल्लेबाजों के पास प्लान बी नहीं दिखा।
यह हार सिर्फ एक मुकाबले की हार नहीं, बल्कि सोच और रणनीति की हार कही जा रही है। द्विपक्षीय सीरीज की सफलता ने शायद टीम को यह भरोसा दिला दिया कि वही आक्रामक फार्मूला बड़े मंच पर भी कारगर रहेगा, लेकिन विश्व कप जैसे टूर्नामेंट में हर पिच, हर परिस्थिति नई चुनौती पेश करती है। अब सेमीफाइनल की राह आसान नहीं रही और आगे के मुकाबले ‘करो या मरो’ जैसे हो गए हैं।
कप्तान का आत्मविश्वास टीम की ताकत होता है, लेकिन जब वही आत्मविश्वास हालात की समझ पर हावी हो जाए तो नुकसान तय है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सूर्यकुमार यादव आत्मविश्वास और संतुलन के बीच सही रेखा खींच पाएंगे? बड़े टूर्नामेंट में जीत सिर्फ बड़े बयान से नहीं, बल्कि परिस्थितियों के मुताबिक लिए गए फैसलों से मिलती है।
