Strait of Hormuz Crisis: पश्चिम एशिया में जारी ईरान युद्ध और होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव के बीच फ्रांस ने अपनी सैन्य सक्रियता को काफी तेज कर दिया है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने आधिकारिक जानकारी देते हुए बताया है कि फ्रांस का परमाणु ऊर्जा से संचालित विमान वाहक युद्धपोत ‘चार्ल्स डी गॉल’ अपने स्ट्राइक ग्रुप के साथ स्वेज नहर के दक्षिण और लाल सागर की ओर बढ़ रहा है। यह कदम फ्रांस और ब्रिटेन के उस प्रस्तावित संयुक्त रक्षात्मक मिशन का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य इस समुद्री मार्ग पर सुरक्षा बहाल करना और फंसे हुए अंतरराष्ट्रीय जहाजों को बाहर निकालना है।
होर्मुज जलडमरूमध्य वर्तमान में वैश्विक ऊर्जा संकट का केंद्र बना हुआ है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने इसे तेल बाजार के इतिहास की सबसे बड़ी आपूर्ति बाधा करार दिया है। 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल के हमलों के बाद से ईरान ने इस मार्ग को लगभग बंद कर रखा है, जिसके कारण बड़ी संख्या में मालवाहक जहाज और तेल टैंकर वहां फंसे हुए हैं। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इस मार्ग से गुजरने वाले जहाजों की बीमा लागत युद्ध से पहले की तुलना में 4 से 5 गुना तक बढ़ गई है।
राष्ट्रपति मैक्रों ने स्पष्ट किया है कि फ्रांस और ब्रिटेन का यह मिशन किसी भी पक्ष के विरुद्ध युद्ध की कार्रवाई नहीं है, बल्कि यह एक रक्षात्मक प्रयास है। इसका मुख्य उद्देश्य जहाज मालिकों और बीमा कंपनियों के भीतर सुरक्षा का भरोसा बहाल करना है ताकि वैश्विक व्यापार दोबारा सुचारू हो सके। मैक्रों ने इस मुद्दे पर ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन से भी सीधी बातचीत की है और वे जल्द ही इस संकट के समाधान के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से भी चर्चा करेंगे। मैक्रों का मानना है कि होर्मुज में शांति स्थापित होने से परमाणु मुद्दों और क्षेत्रीय स्थिरता पर बातचीत को आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी।
फ्रांसीसी सेना के अनुसार, इस मिशन की औपचारिक शुरुआत के लिए दो प्रमुख शर्तों का पूरा होना अनिवार्य है। सबसे पहले समुद्री जहाजों पर मंडरा रहा वास्तविक खतरा कम होना चाहिए और जहाजरानी उद्योग को सुरक्षा का पूरा भरोसा मिलना चाहिए। इसके साथ ही फ्रांस ने यह भी स्पष्ट किया है कि किसी भी सैन्य अभियान या सुरक्षा मिशन के लिए ईरान सहित सभी पड़ोसी देशों की सहमति अनिवार्य होगी। फिलहाल, 30 से अधिक देशों के सैन्य योजनाकार इस रणनीति को अंतिम रूप देने में जुटे हैं ताकि वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए जीवनरेखा माने जाने वाले इस समुद्री मार्ग को सुरक्षित खोला जा सके।
