दुनिया भर में अचानक भड़कने वाले हिंसक विरोध-प्रदर्शनों और बड़े जनांदोलनों के पीछे काम कर रहे एक अंतरराष्ट्रीय सिंडिकेट का सनसनीखेज पर्दाफाश हुआ है। फॉक्स न्यूज डिजिटल की एक विस्तृत खोजी रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि 13 देशों के कुल 101 संगठन मिलकर एक सुनियोजित ‘ग्लोबल प्रोटेस्ट इकोसिस्टम’ का संचालन कर रहे हैं। इस खुलासे के मुताबिक, फ्रांस की सड़कों पर मचे बवाल से लेकर भारत और अन्य देशों में युवाओं के नेतृत्व में होने वाले बड़े आंदोलनों के तार आपस में सीधे तौर पर जुड़े हुए हैं। यह नेटवर्क स्थानीय मुद्दों और जनआक्रोश को हवा देकर सीमाओं के पार अराजकता फैलाने और उसका दायरा व्यापक करने का काम कर रहा है।
कम्युनिस्ट गुटों से लेकर मीडिया तक फैला है यह जाल
फॉक्स न्यूज की खोजी पत्रकार असरा क्यू नोमानी द्वारा की गई इस पड़ताल में उस अदृश्य तंत्र की परतों को खोला गया है जो पर्दे के पीछे रहकर वैश्विक अशांति की स्क्रिप्ट तैयार करता है। इस सिंडिकेट में वामपंथी और समाजवादी संगठन, ट्रेड यूनियनें, छात्र गुट, एडवोकेसी नेटवर्क और कुछ चुनिंदा मीडिया संस्थान सक्रिय रूप से शामिल हैं। यह नेटवर्क अलग-अलग देशों के स्थानीय असंतोष को एक मंच पर लाकर उसे अंतरराष्ट्रीय रंग देने की रणनीति अपनाता है। रिपोर्ट के मुताबिक, एक देश में शुरू होने वाले विरोध-प्रदर्शनों के संदेशों, नारों और एजेंडे को दूसरे देशों में तेजी से वायरल करने और संगठित करने में ये संगठन अहम भूमिका निभाते हैं।
सीमाओं के पार ‘टूलकिट’ की तरह काम कर रहा तंत्र
जांच में यह भी रेखांकित किया गया है कि भले ही अलग-अलग देशों की समस्याएं भिन्न हों, लेकिन उनके विरोध प्रदर्शनों का तरीका, नैरेटिव और टाइमिंग बिल्कुल एक जैसी नजर आती है। यह पूरा ढांचा किसी एक सीमा में बंधा नहीं है, बल्कि एक अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क की तरह काम करता है जो दुनिया भर में सरकारों के खिलाफ असंतोष भड़काने और विरोध प्रदर्शनों को खाद-पानी देने के लिए आपसी तालमेल बिठाता है। वैश्विक सुरक्षा और आंतरिक शांति के लिहाज से इस रिपोर्ट ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में एक नई बहस छेड़ दी है। ‘ग्लोबल केओस इंक’ (Chaos Inc) के रूप में काम करने वाले इन समूहों की संख्या बढ़कर 101 हो गई है और ये नए सिरे से बड़े प्रदर्शन करने की योजना बना रहे हैं। यह रिपोर्ट फॉक्स न्यूज की एक पुरानी जांच पर आधारित है, जिसमें पहले फ्रांस के छात्र विरोध-प्रदर्शनों से जुड़े 50 संगठनों की पहचान की गई थी, जिनकी संख्या 19 अक्टूबर तक बढ़कर 54 और अब ताजा जांच में 101 तक पहुंच गई है।
भारत और फ्रांस के आंदोलन कैसे जुड़े हैं?
फॉक्स न्यूज की इस जांच में ‘इंडियन अलायंस पेरिस’ (IAP) का विशेष रूप से जिक्र किया गया है। यह फ्रांस में स्थित छात्रों, शोधकर्ताओं और पेशेवरों का एक संगठन है जो फ्रांस और भारत के विरोध-प्रदर्शनों के संदेशों को आपस में जोड़ने का काम कर रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, इस संगठन ने फ्रांस में हो रहे प्रदर्शनों को बढ़ावा दिया है और इनकी तुलना भारत में युवाओं द्वारा किए जा रहे विरोध-प्रदर्शनों से की है। फॉक्स न्यूज द्वारा उद्धृत एक सोशल मीडिया पोस्ट में इस संगठन ने दोनों देशों के युवा प्रदर्शनकारियों का समर्थन करते हुए लिखा था कि जेन ज़ी (Gen Z) के लिए फ्रांस में और भारत में आज का दिन बहुत बढ़िया (Bravo) है।
इसके अलावा, रिपोर्ट में ‘प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल’ की भूमिका पर भी प्रकाश डाला गया है, जो एक अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक संगठन है। इसने 16 अक्टूबर की एक ब्रीफिंग में फ्रांस, स्पेन, भारत और अल्बानिया में हो रहे विरोध-प्रदर्शनों को एक मंच पर लाने का काम किया। रिपोर्ट में यह सवाल उठाया गया है कि क्या ये उभरते हुए विद्रोह एक संगठित राजनीतिक शक्ति का रूप ले सकते हैं ताकि उन हालात को बदला जा सके जिनकी वजह से ये विद्रोह पैदा हुए हैं। भारत में हो रहे विरोध-प्रदर्शनों में चुनाव आयोग के खिलाफ चल रहे प्रदर्शन भी शामिल हैं, जहां प्रदर्शनकारी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं।
नेविल रॉय सिंघम कनेक्शन और वैश्विक समन्वय
फॉक्स न्यूज की जांच का एक बड़ा हिस्सा उन संगठनों पर केंद्रित है जिनका संबंध नेविल रॉय सिंघम से बताया गया है। अमेरिका में जन्मे टेक्नोलॉजी उद्यमी सिंघम शंघाई में रहते हैं और उनका नाता कम्युनिस्ट और समाजवादी समूहों के एक बड़े नेटवर्क से जोड़ा जाता है। जिन संगठनों का इसमें जिक्र किया गया है उनमें ‘ब्रेकथ्रू न्यूज़’, ‘कोडपिंक’ और ‘पार्टी फॉर सोशलिज्म एंड लिबरेशन’ शामिल हैं। फॉक्स न्यूज का आरोप है कि इन समूहों ने रिपोर्टिंग, सोशल मीडिया अभियानों और राजनीतिक संदेशों के जरिए विरोध प्रदर्शनों को और व्यापक बनाने में मदद की है। खासकर ‘ब्रेकथ्रू न्यूज़’ ने फ्रांस और भारत में हुए विरोध प्रदर्शनों को कवर किया है और इन्हें सरकारी नीतियों तथा मितव्ययिता (Austerity) के खिलाफ चल रहे एक बड़े अंतरराष्ट्रीय आंदोलन के हिस्से के रूप में पेश किया है।
इस जांच में ‘ट्राइकॉन्टिनेंटल’ नामक एक रिसर्च इंस्टीट्यूट का भी जिक्र है जिसका नेतृत्व विजय प्रशांत करते हैं, और इसके व्यापक एक्टिविस्ट नेटवर्क के साथ संबंधों की ओर भी इशारा किया गया है। विजय प्रशांत ने 18 अक्टूबर को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर एक पोस्ट के जरिए पेरिस, नई दिल्ली और ब्यूनस आयर्स में हो रहे विरोध प्रदर्शनों के बीच समानताएं बताई थीं। उन्होंने लिखा था कि पेरिस-नई दिल्ली-ब्यूनस आयर्स और आगे जोड़ा कि गुस्से को अपना समय लेने दें क्योंकि गुस्सा एक बड़ी ताकत बन सकता है।
