UP BJP Reshuffle: उत्तर प्रदेश में 2027 का विधानसभा चुनाव भले ही अभी दूर दिखाई दे रहा हो, लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने इसके लिए युद्धस्तर पर अपनी रणनीतिक तैयारियां शुरू कर दी हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में उम्मीद के मुताबिक परिणाम न मिलने से सबक लेते हुए पार्टी अब अपने संगठनात्मक ढांचे में एक बड़ा और व्यापक फेरबदल करने जा रही है। राजनीतिक गलियारों में चल रही चर्चाओं के अनुसार, यूपी बीजेपी की मौजूदा टीम के लगभग पचास प्रतिशत चेहरों को बदला जा सकता है। इस महा-अभियान का मुख्य उद्देश्य संगठन से एंटी-इन्कम्बेंसी यानी सत्ता विरोधी लहर को खत्म करना और नए, ऊर्जावान चेहरों को आगे लाना है।
बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व ने इस बार साफ कर दिया है कि एक व्यक्ति, एक पद के सिद्धांत का कड़ाई से पालन किया जाएगा। पार्टी अब ऐसे प्रभावशाली नेताओं की सूची तैयार कर रही है जो लंबे समय से संगठन और सरकार दोनों में महत्वपूर्ण पदों पर काबिज हैं। चुनावी मोड में आ चुकी बीजेपी का मानना है कि आगामी बड़ी लड़ाई के लिए ऐसे समर्पित नेताओं की जरूरत है जो संगठन को अपना पूरा समय दे सकें। इसके तहत दोहरे पदों पर बैठे नेताओं को किसी एक मोर्चे से हटाकर नई जिम्मेदारियां सौंपी जाएंगी।
हालिया रणनीतिक बैठकों से जो संकेत मिल रहे हैं, वे उत्तर प्रदेश में बड़े सांगठनिक पुनर्गठन की ओर इशारा करते हैं। इसके तहत उत्तर प्रदेश के सभी छह सांगठनिक क्षेत्रों, जिनमें ब्रज, अवध, काशी, गोरखपुर, पश्चिम और कानपुर-बुंदेलखंड शामिल हैं, के क्षेत्रीय अध्यक्षों को बदला जा सकता है। नए अध्यक्षों को जमीनी स्तर पर अपनी नई टीम चुनने की पूरी स्वायत्तता दी जाएगी। इसके साथ ही युवाओं, महिलाओं, किसानों सहित पिछड़े, दलित, जनजाति और अल्पसंख्यक मोर्चों के अध्यक्षों को भी बदला जाना लगभग तय माना जा रहा है। यूपी बीजेपी के नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी की कमान में यह फेरबदल जमीनी स्तर पर शुरू भी हो चुका है, जिसके तहत राज्य के करीब सत्तर से नब्बे जिलों में पहले ही नए जिलाध्यक्ष तैनात किए जा चुके हैं।
बीजेपी ने आगामी विधानसभा चुनाव में सत्ता की हैट्रिक लगाने के लिए एक बेहद खास और केंद्रित माइक्रो-प्लानिंग तैयार की है। पार्टी का सबसे ज्यादा फोकस राज्य की उन इकसठ विधानसभा सीटों पर है, जहां उसे पिछले तीन चुनावों यानी 2012, 2017 और 2022 में लगातार हार का सामना करना पड़ा है। इन कठिन सीटों में सबसे बड़ा हिस्सा पूर्वी उत्तर प्रदेश का है, जहां आजमगढ़, मऊ, जौनपुर, गाजीपुर और मिर्जापुर जैसे प्रमुख जिलों को मिलाकर कुल बाईस सीटें शामिल हैं। इसके बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश का नंबर आता है, जहां सहारनपुर, मुरादाबाद और बिजनौर जैसे जिलों की तेरह सीटों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। बाकी बची हुई छब्बीस सीटें पूरे प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में फैली हुई हैं।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने कड़े निर्देश जारी किए हैं कि चुनावी तैयारियों के शुरुआती दौर में पार्टी के शीर्ष नेता और रणनीतिकार केवल इन्हीं इकसठ मुश्किल सीटों पर अपनी पूरी ताकत झोंकेंगे। गौरतलब है कि पूर्वी और पश्चिमी यूपी की इन पैंतीस सीटों में से सत्ताइस सीटों पर साल 2022 में समाजवादी पार्टी ने कब्जा जमाया था। हालांकि, हाल ही में स्वार, रामपुर और कुंदरकी जैसे सपा के मजबूत गढ़ों में हुए उपचुनावों में मिली अप्रत्याशित जीत ने बीजेपी कार्यकर्ताओं के हौसले बुलंद कर दिए हैं।
साल 2024 के आम चुनाव में समाजवादी पार्टी के पीडीए यानी पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक फॉर्मूले ने बीजेपी के पारंपरिक सोशल इंजीनियरिंग के गणित को काफी नुकसान पहुंचाया था। इसी को काउंटर करने के लिए बीजेपी अब गैर-यादव ओबीसी, अति-पिछड़ों और दलित वर्गों को संगठन के साथ-साथ हालिया कैबिनेट विस्तार में भी अधिक प्रतिनिधित्व देकर अपने पाले में वापस लाने की कवायद में जुट गई है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की केंद्रीय नेतृत्व के साथ हुई बैठकों के बाद अब सरकार और संगठन के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने के लिए जिम्मेदारियों का स्पष्ट विभाजन किया जा रहा है, ताकि 2027 के महामुकाबले से पहले किसी भी स्तर पर असमंजस की स्थिति न रहे।
