सिंधु जल समझौते पर भारत का सख्त रुख, हेग कोर्ट का फैसला ठुकराया

India Pakistan Water Dispute: भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से जारी सिंधु जल विवाद को लेकर एक अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता अदालत ने शुक्रवार को नया फैसला सुनाया, लेकिन भारत ने इसे पूरी तरह खारिज कर दिया। अदालत ने अपने फैसले में यह तय करने की कोशिश की कि भारत अपने बांधों में अधिकतम कितना पानी रोक सकता है।

विदेश मंत्रालय रणधीर जायसवाल
विदेश मंत्रालय रणधीर जायसवाल

Indus Waters Treaty Dispute: भारत और पाकिस्तान के बीच दशकों पुराने सिंधु जल समझौते को लेकर तनाव एक बार फिर चरम पर पहुंच गया है। हेग स्थित एक इंटरनेशनल मध्यस्थता अदालत ने बीते शुक्रवार यानी 15 मई को सिंधु नदी के पानी के मामले में एक और नया फैसला सुनाया। इस फैसले में यह तय करने की कोशिश की गई है कि भारत जम्मू-कश्मीर में बन रहे अपने बांधों में अधिकतम कितना पानी रोक सकता है। भारत सरकार ने इस फैसले को सिरे से खारिज करते हुए सीधे तौर पर ठुकरा दिया है। विदेश मंत्रालय ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया है कि यह कोर्ट ही पूरी तरह गैरकानूनी है, इसलिए इसका कोई भी फैसला भारत को मंजूर नहीं है।

इस पूरे विवाद को समझने के लिए साल 1960 में हुए सिंधु जल समझौते को देखना होगा, जिसमें विश्व बैंक भी एक गवाह के तौर पर शामिल था। इस ऐतिहासिक समझौते के तहत रावी, ब्यास और सतलज जैसी पूर्वी नदियों का पानी भारत को मिला था, जबकि सिंधु, झेलम और चिनाब जैसी पश्चिमी नदियों का पानी पाकिस्तान के हिस्से में गया था। संधि के नियमों के तहत पश्चिमी नदियों पर भारत को बिना पानी रोके बिजली बनाने की सीमित छूट दी गई है। इसी के तहत भारत ने कश्मीर में झेलम नदी पर किशनगंगा और चिनाब नदी पर रातले नाम के दो बड़े बांध बनाने शुरू किए। पाकिस्तान ने इन दोनों बांधों के डिजाइन पर आपत्ति जताई और दावा किया कि ये संधि के नियमों के खिलाफ हैं।

विवाद बढ़ने पर पाकिस्तान ने साल 2016 में वर्ल्ड बैंक के पास जाकर एक आर्बिट्रेशन कोर्ट बनाने की मांग की। दूसरी तरफ भारत चाहता था कि इस तकनीकी मामले को एक न्यूट्रल एक्सपर्ट के जरिए सुलझाया जाए, जैसा कि संधि में लिखा था। लेकिन साल 2022 में वर्ल्ड बैंक ने दोनों ही व्यवस्थाएं एक साथ लागू कर दीं, यानी न्यूट्रल एक्सपर्ट भी नियुक्त कर दिया और आर्बिट्रेशन कोर्ट भी बना दी। भारत ने शुरू से ही कहा कि यह आर्बिट्रेशन कोर्ट गैरकानूनी तरीके से बनाई गई है और इसका गठन ही संधि का उल्लंघन है। इसी वजह से भारत ने इस कोर्ट की किसी भी बैठक या कार्यवाही में कभी हिस्सा नहीं लिया।

सीमा पार आतंकवाद को लेकर भी भारत ने अब बेहद कड़ा रुख अपना लिया है। अप्रैल 2025 में हुए पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत सरकार ने इस पूरी सिंधु जल संधि पर ही रोक लगा दी। भारत ने साफ कह दिया कि जब तक पाकिस्तान आतंकवाद बंद नहीं करता, यह संधि अभी के लिए ठंडे बस्ते में रहेगी। भारत के इस बड़े कदम से पाकिस्तान में हाहाकार मच गया और उसने इसे युद्ध जैसा कदम बताया। इससे पहले भी इस कोर्ट ने कई फैसले सुनाए थे, जिसमें कहा गया था कि भारत को पश्चिमी नदियों का पानी पाकिस्तान के लिए बहने देना होगा, लेकिन भारत ने उन पुराने फैसलों को भी ठुकरा दिया था।

अब 15 मई को आए इस नए फैसले पर भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने भारत का रुख दोबारा साफ किया है। उन्होंने कहा कि भारत इस फैसले को साफ तौर पर ठुकराता है, जैसे पहले के सभी फैसले ठुकराए गए हैं। भारत ने कभी इस कोर्ट को कानूनी नहीं माना, इसलिए इसका कोई भी फैसला, कार्यवाही या निर्णय हमारे लिए शून्य और अमान्य है। इसके साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया कि सिंधु जल संधि को रोक कर रखने का भारत का फैसला अभी भी पूरी तरह लागू है।

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