गाजियाबाद: 13 साल के लंबे और दर्दनाक इंतजार के बाद आखिरकार हरीश राणा का सफर थम गया। मंगलवार, 24 मार्च 2026 को शाम 4:10 बजे एम्स में अंतिम सांस लेने के बाद, बुधवार सुबह दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट में उनका अंतिम संस्कार किया गया। परिवार के लिए यह घड़ी अत्यंत भावुक और कठिन थी। सुबह 8:30 बजे हरीश का पार्थिव शरीर लेकर उनके पिता विनोद राणा, बहन और भाई श्मशान घाट पहुंचे, जहां उनके भाई ने उन्हें मुखाग्नि दी।
जाते-जाते दे गए नई जिंदगी
हरीश राणा भले ही इस दुनिया से चले गए, लेकिन वे दूसरों के जीवन में रोशनी छोड़ गए हैं। दधीचि संस्था के माध्यम से हरीश की आंखें और हार्ट वॉल्व दान किए गए हैं। संस्था से जुड़े दीपांशु ने बताया कि हरीश के पिता ने बहुत पहले ही अंगदान की इच्छा जताई थी। एक खिलाड़ी के रूप में देश के लिए खेलने का सपना देखने वाले हरीश ने मृत्यु के बाद भी समाज के प्रति अपना योगदान दिया।
बॉक्सिंग के होनहार खिलाड़ी थे हरीश
हादसे से पहले की यादें साझा करते हुए राजेश ठाकुर ने बताया कि हरीश लगभग छह फीट लंबे एक शानदार एथलीट और बॉक्सिंग के बेहतरीन खिलाड़ी थे। विडंबना देखिए कि जिस दिन यह हादसा हुआ, उसके अगले ही दिन उनका बॉक्सिंग मैच होना था। अगस्त 2013 में चंडीगढ़ में एक बिल्डिंग की चौथी मंजिल से गिरने के बाद उनके जीवन की पूरी दिशा बदल गई। हालांकि शुरुआत में इसे लेकर भ्रम की स्थिति बनी, लेकिन परिवार ने किसी पर भी पुलिस केस न कर केवल अपने बेटे के इलाज पर ध्यान केंद्रित किया।
सहयोग के लिए पिता ने जताया आभार
अंतिम संस्कार के दौरान हरीश के पिता विनोद राणा ने मीडिया से प्रत्यक्ष बात नहीं की, लेकिन उन्होंने एम्स के डॉक्टरों, सुप्रीम कोर्ट के वकीलों और ब्रह्माकुमारी संस्थान का विशेष आभार व्यक्त किया। ब्रह्माकुमारी की सिस्टर लवली ने बताया कि 13 साल तक इस कठिन परिस्थिति में डटे रहने की आध्यात्मिक ताकत परिवार को संस्थान से ही मिली। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर प्रशासनिक अधिकारियों ने भी अंतिम संस्कार की प्रक्रिया में परिवार का पूरा सहयोग किया। कांग्रेस के यूपी अध्यक्ष अजय राय भी श्रद्धांजलि देने पहुंचे और परिवार के धैर्य की सराहना की।
कानूनी प्रक्रिया और मां का दर्द
हरीश को सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद एम्स के 10 डॉक्टरों के बोर्ड की देखरेख में ‘पैसिव यूथेनेशिया’ (इच्छामृत्यु) दी गई थी। इस मामले की सबसे दुखद कड़ी यह रही कि इच्छामृत्यु के कानूनी कागजातों पर हस्ताक्षर स्वयं हरीश की मां को करने पड़े, जिन्होंने 13 साल तक पल-पल अपने बेटे की सेवा की थी। चारों तरफ से इलाज की उम्मीद टूटने के बाद परिवार ने भारी मन से यह कठिन फैसला लिया था।
