BRICS Summit 2026: ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के समापन सत्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तकनीक और महत्वपूर्ण खनिजों को लेकर दुनिया के सामने उभर रही चुनौती पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि टेक्नोलॉजी और जरूरी खनिजों का इस्तेमाल अगर दबाव बनाने या हथियार के तौर पर किया जाने लगा, तो इसका असर वैश्विक विकास पर पड़ सकता है। प्रधानमंत्री ने ब्रिक्स देशों से मिलकर ऐसी तकनीक तैयार करने की अपील की, जिसकी पहुंच केवल कुछ देशों तक सीमित न रहे और विकासशील देशों को भी उसका लाभ मिल सके।
भारत की अध्यक्षता में आयोजित दो दिवसीय ब्रिक्स सम्मेलन के अंतिम सत्र का केंद्र लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता रहा। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में कहा कि इस समूह की सबसे बड़ी ताकत उसके सदस्य देशों की विविधता और उनके बीच सहयोग की क्षमता है। उन्होंने किसी देश का सीधे तौर पर नाम नहीं लिया, हालांकि उनकी टिप्पणी को उन नीतियों के संदर्भ में देखा जा रहा है, जिनके तहत दुर्लभ खनिजों और उन्नत तकनीकी उपकरणों के निर्यात को अलग-अलग मौकों पर सीमित किया गया है।
मोदी ने कहा कि तकनीक और महत्वपूर्ण खनिज वैश्विक अर्थव्यवस्था तथा विकास के लिए बेहद अहम हैं। ऐसे संसाधनों को नियंत्रित करने या उनका इस्तेमाल रणनीतिक दबाव के लिए करने से कई देशों की विकास प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। इसलिए जरूरत ऐसी व्यवस्था बनाने की है, जिसमें तकनीकी प्रगति का फायदा ज्यादा से ज्यादा देशों और समाजों तक पहुंच सके।
ग्लोबल साउथ को साथ लेकर आगे बढ़ने की अपील
प्रधानमंत्री ने ब्रिक्स के बढ़ते महत्व का जिक्र करते हुए कहा कि सदस्य देशों की आर्थिक परिस्थितियां और विकास की जरूरतें एक जैसी नहीं हैं। इसके बावजूद आपसी सहयोग के जरिए साझा समाधान तैयार किए जा सकते हैं। उन्होंने जोर दिया कि ब्रिक्स के भीतर विकसित होने वाले समाधान सिर्फ सदस्य देशों तक सीमित नहीं रहने चाहिए, बल्कि उन्हें ग्लोबल साउथ के दूसरे विकासशील देशों की जरूरतों के अनुरूप भी उपयोगी बनाया जाना चाहिए।
मोदी के अनुसार, विकासशील देशों का ब्रिक्स पर भरोसा इस वजह से मजबूत हुआ है क्योंकि यहां उनकी आवाज और उनके अनुभवों को महत्व दिया जाता है। उन्होंने सहयोग की ऐसी सोच की जरूरत बताई, जिसमें विकासशील देशों के लिए समाधान तय करने के बजाय उन्हें प्रक्रिया में भागीदार बनाया जाए।
प्रधानमंत्री ने दुनिया में बढ़ते तनाव और अलग-अलग तरह के संकटों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि महामारी, जलवायु संबंधी आपदाओं और सप्लाई चेन में आने वाली बाधाओं ने यह दिखा दिया है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था कितनी परस्पर जुड़ी हुई है। किसी एक हिस्से में पैदा हुई समस्या का असर दूर-दराज के देशों तक पहुंच सकता है और अंततः इसकी कीमत आम लोगों को चुकानी पड़ती है।
बीमारियों और आपदाओं से निपटने के लिए सहयोग
ब्रिक्स देशों के बीच संक्रामक बीमारियों के संभावित खतरे से निपटने के लिए शुरुआती चेतावनी व्यवस्था विकसित करने पर सहमति बनी है। इसका उद्देश्य बीमारी के प्रसार से जुड़े जोखिमों की जल्द पहचान करना और स्थिति गंभीर होने से पहले जरूरी कदम उठाने की क्षमता को बेहतर बनाना है।
आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में भी शुरुआती चेतावनी से जुड़े आंकड़ों के बेहतर इस्तेमाल और एकीकरण के लिए दिशानिर्देश तैयार किए गए हैं। इसके साथ ही लॉजिस्टिक्स और सप्लाई चेन को अधिक मजबूत बनाने के लिए ब्रिक्स लॉजिस्टिक्स सप्लाई चेन फ्रेमवर्क पर भी काम किया गया है। इसका लक्ष्य वैश्विक स्तर पर आपूर्ति व्यवस्था को ज्यादा भरोसेमंद और संकटों के प्रति सक्षम बनाना है।
स्टार्टअप से लेकर डिजिटल खेती तक पर जोर
ब्रिक्स सहयोग का दायरा नवाचार और डिजिटल तकनीक तक भी बढ़ाया गया है। स्टार्टअप तथा इनक्यूबेटर्स के बीच संपर्क बढ़ाने के लिए BRICS इनक्यूबेटर नेटवर्क की योजना बनाई गई है। इसके अलावा BRICS स्टार्टअप इनोवेशन फंड के माध्यम से ऐसे नए समाधानों को प्रोत्साहित करने का प्रस्ताव है, जिन्हें बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जा सके।
कृषि क्षेत्र में डिजिटल तकनीक के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए BRICS डिजिटल कृषि नेटवर्क तैयार किया गया है। इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), जियोस्पेशियल टेक्नोलॉजी और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर जैसी तकनीकों को किसानों की जरूरतों से जोड़ने पर ध्यान दिया गया है।
प्रधानमंत्री मोदी ने यह भी कहा कि ब्रिक्स का सहयोग केवल सरकारों के बीच होने वाली बातचीत तक सीमित नहीं रहना चाहिए। BRICS Connect जैसी पहलों के जरिए रोजगार, महिलाओं की कार्यक्षेत्र में भागीदारी और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर भी काम किया जा रहा है। वहीं MSME Cooperation Portal के माध्यम से छोटे और मध्यम कारोबारों को जरूरी जानकारी, वित्तीय अवसरों और नए बाजारों तक पहुंच दिलाने की दिशा में सहयोग बढ़ाने की कोशिश है।
