महंगाई की बढ़ती चिंता और कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के बीच रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने ब्याज दरों को लेकर बड़ा फैसला लिया है। RBI ने रेपो रेट में 0.25 फीसदी यानी 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी की है। इसके बाद रेपो रेट 5.25 फीसदी से बढ़कर 5.50 फीसदी हो गया है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब घरेलू महंगाई के साथ-साथ पश्चिम एशिया में तनाव और महंगे कच्चे तेल ने महंगाई का जोखिम बढ़ा दिया है।
कर्ज की लागत पर पड़ सकता है सीधा असर
RBI के इस फैसले का सीधा असर देश में कर्ज की लागत पर पड़ सकता है। रेपो रेट वह दर है जिस पर RBI बैंकों को पैसा उपलब्ध कराता है। जब रेपो रेट बढ़ता है तो बैंकों के लिए फंडिंग महंगी हो सकती है। इसका असर आगे चलकर होम लोन, पर्सनल लोन और दूसरे कर्ज की ब्याज दरों पर देखने को मिल सकता है।
RBI ने अपनाया सख्त रुख
पिछले कई महीनों से RBI ने रेपो रेट को 5.25 फीसदी पर स्थिर रखा था। दिसंबर 2025 के बाद लगातार चार नीतिगत बैठकों में दरों में बदलाव नहीं किया गया था। अब महंगाई के दबाव और बदलते वैश्विक माहौल के बीच केंद्रीय बैंक ने सख्त रुख अपनाया है।
महंगाई RBI के इस फैसले की सबसे बड़ी वजहों में शामिल है। अगस्त में भारत की खुदरा महंगाई बढ़कर 4.82 फीसदी हो गई थी, जो RBI के 4 फीसदी लक्ष्य से लगातार तीसरे महीने ऊपर रही।
रुपये पर दबाव भी बड़ी चुनौती
RBI के लिए रुपये पर बना दबाव भी एक बड़ी चुनौती है। विदेशी निवेशकों की बिकवाली और वैश्विक बॉन्ड यील्ड में तेजी के बीच रुपया कमजोर हुआ है। ऐसे में ब्याज दरों में बढ़ोतरी से घरेलू एसेट्स को कुछ सहारा मिलने और रुपये पर दबाव कम करने में मदद मिल सकती है।
ब्याज दर बढ़ने से बैंकिंग सेक्टर को कुछ फायदा मिल सकता है, क्योंकि कर्ज की दरें बढ़ने से मार्जिन को सहारा मिल सकता है। हालांकि, दूसरी तरफ एनबीएफसी, रियल एस्टेट और ब्याज दरों के प्रति संवेदनशील कंज्यूमर कंपनियों पर दबाव बढ़ सकता है, क्योंकि इनके लिए फंडिंग लागत बढ़ने का खतरा रहता है।
नई EMI हो सकती है महंगी
होम लोन लेने वाले ग्राहकों के लिए भी RBI का यह फैसला अहम है। अगर बैंक रेपो रेट का असर कर्ज की ब्याज दरों पर डालते हैं तो नई EMI महंगी हो सकती है। जिन लोगों का लोन फ्लोटिंग रेट से जुड़ा है, उनके लिए ब्याज दरों में बदलाव का असर खास तौर पर महत्वपूर्ण होगा।
कुल मिलाकर, RBI का यह कदम महंगाई को काबू में रखने और बढ़ते वैश्विक जोखिमों के बीच कीमतों की स्थिरता बनाए रखने की कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है।
