हिन्दू पंचांग के अनुसार हर महीने के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत रखा जाता है। इस दिन भगवान शिव की पूजा करने का विधान है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भोलेनाथ की आराधना करने से घर में सुख-शांति बनी रहती है और सभी समस्याओं से छुटकारा मिलता है। अश्विन का महीना शुरू हो चुका है और भक्त इस महीने के प्रदोष व्रत का इंतजार कर रहे हैं।
अक्टूबर का पहला प्रदोष व्रत और तिथि विवरण
पंचांग के अनुसार अश्विन महीने के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि की शुरुआत 7 अक्टूबर को रात 11 बजकर 16 मिनट पर होगी। वहीं इस तिथि का समापन 8 अक्टूबर को रात 10 बजकर 15 मिनट पर होगा। प्रदोष काल के समय को ध्यान में रखते हुए यह प्रदोष व्रत 8 अक्टूबर, दिन गुरुवार को रखा जाएगा। गुरुवार के दिन पड़ने के कारण इसे गुरु प्रदोष व्रत भी कहा जाएगा।
पूजा का शुभ मुहूर्त
8 अक्टूबर को भगवान शिव की पूजा के लिए शुभ मुहूर्त शाम 5 बजकर 59 मिनट से लेकर रात 8 बजकर 27 मिनट तक रहेगा। इस प्रदोष काल की अवधि में भक्त भगवान शिव और माता पार्वती की विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर सकते हैं।
प्रदोष व्रत की पूजा विधि
प्रदोष व्रत के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करने के बाद भगवान शिव का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लिया जाता है। इसके बाद भगवान शिव का दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल यानी पंचामृत से अभिषेक किया जाता है। अभिषेक के बाद शिवलिंग पर 11 या 21 बेलपत्र, धतूरा, आक के फूल, फल, सुपारी, लौंग, इलायची, धूप, दीप, गंध और चावल आदि नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं। पूजा के दौरान शक्कर और घी से बने मिष्ठान का भोग लगाना अत्यंत शुभ माना जाता है।
इसके बाद शिव मंत्रों का जाप और शिव चालीसा का पाठ करें तथा प्रदोष व्रत की कथा पढ़ें। पूजा के अंत में घी के दीपक से भगवान शिव की आरती की जाती है। पूरे दिन उपवास रखते हुए मन में शिव का स्मरण करना चाहिए। इसके बाद शाम के समय पुनः स्नान करके प्रदोष काल के शुभ मुहूर्त में भगवान शिव की विधि-विधान से पूजा संपन्न की जाती है।
