भारत ने सिंधु जल संधि को लेकर अपना रुख एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है। विदेश मंत्रालय ने कहा है कि संधि को स्थगित रखने का भारत का फैसला जारी रहेगा और किसी बाहरी संस्था को इस संप्रभु निर्णय पर हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है। यह प्रतिक्रिया पाकिस्तान की ओर से मामले को कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन के सामने ले जाने की कोशिशों के बीच आई है।
विदेश मंत्रालय के मुताबिक, जिस कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ने इस मामले में अंतरिम उपायों और मौजूदा स्थिति को लेकर फैसला दिया है, भारत उसे वैध नहीं मानता। मंत्रालय ने कहा कि इस संस्था का गठन सिंधु जल संधि की शर्तों के अनुरूप नहीं हुआ है। इसी आधार पर भारत ने उसके ताजा फैसले को स्वीकार करने से इनकार कर दिया है।
भारत का कहना है कि विश्व बैंक की ओर से इस तथाकथित कोर्ट का गठन संधि में मौजूद प्रावधानों के विपरीत किया गया था। नई दिल्ली पहले भी इस संस्था के अधिकार क्षेत्र को स्वीकार नहीं करती रही है और उसकी कार्यवाही में हिस्सा लेने से दूर रही है। विदेश मंत्रालय ने दोहराया कि भारत ने इस निकाय के पहले के फैसलों को भी मान्यता नहीं दी है।
विदेश मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया कि आर्बिट्रेशन कोर्ट के किसी फैसले से भारत के उन निर्णयों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, जिन्हें देश अपनी संप्रभु शक्तियों के तहत लेता है। मंत्रालय के अनुसार, भारत की ओर से चलाए जा रहे या भविष्य में प्रस्तावित परियोजनाओं पर इस संस्था के आदेश का कोई असर नहीं होगा।
इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि पिछले साल अप्रैल में हुए पहलगाम आतंकी हमले से जुड़ी है। 22 अप्रैल को हुए हमले में 26 लोगों की मौत के बाद भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ कई कड़े कदम उठाए थे। इन्हीं फैसलों में सिंधु जल संधि को स्थगित करना भी शामिल था।
भारत लगातार यह कहता रहा है कि संधि को रोकने का फैसला पाकिस्तान की ओर से सीमा पार आतंकवाद को दिए जा रहे कथित समर्थन के संदर्भ में लिया गया है। नई दिल्ली का आरोप है कि आतंकवाद और सामान्य द्विपक्षीय संबंधों को अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता।
अब आर्बिट्रेशन कोर्ट की ओर से जारी ताजा आदेश के बावजूद भारत ने यह साफ कर दिया है कि सिंधु जल संधि को स्थगित रखने का उसका फैसला नहीं बदलेगा। यानी फिलहाल नई दिल्ली इस मामले में किसी बाहरी न्यायिक या मध्यस्थता संस्था के हस्तक्षेप को स्वीकार करने के मूड में नहीं है।
