वर्ष 1981 के एक दोहरे हत्याकांड के मामले में न्याय मिलने में हुई अत्यधिक देरी पर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है। इस मामले में निचली अदालत को सुनवाई पूरी करने में 22 साल का समय लगा, जबकि झारखंड हाई कोर्ट ने भी दोषसिद्धि के खिलाफ दायर अपील पर फैसला सुनाने में लगभग 22 साल लगा दिए। इस 45 साल लंबी कानूनी लड़ाई के दौरान कुल छह में से पांच आरोपियों की मौत हो चुकी है। अब एकमात्र 70 वर्षीय जीवित दोषी, जो फिलहाल अस्पताल में भर्ती है, जेल से अपनी कानूनी लड़ाई लड़ रहा है। मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच ने इस असाधारण देरी पर चिंता जताते हुए दोषी की सजा पर रोक लगा दी है और उसे तत्काल जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे घटनाक्रम को आपराधिक न्यायिक व्यवस्था की विफलता करार दिया है। पीठ ने कहा कि यह मामला एक ऐसे तंत्र को दर्शाता है जहां एक गंभीर अपराध के लिए कोई प्रभावी सजा नहीं मिल सकी और दूसरी तरफ आरोपियों को 22 साल तक चले लंबे मुकदमे की प्रताड़ना झेलनी पड़ी। इसके बाद अपील खारिज होने में भी दो दशक से अधिक का समय बीत गया।
अदालत ने सवाल उठाया कि जब घटना 1981 की थी, तो ट्रायल कोर्ट को फैसला सुनाने में 2002 तक का समय क्यों लगा और फिर हाई कोर्ट को भी इसे तय करने में 22 साल क्यों लगे। बेंच ने इस बात की गहन जांच करने का फैसला किया है कि आखिर दोनों अदालतों में इतना लंबा समय क्यों लगा।
दोषी की ओर से पेश वकील फौजिया शकील ने अदालत में दलील दी कि यदि याचिकाकर्ता को जमानत नहीं दी गई, तो उसे ऐसा गंभीर नुकसान और क्षति होगी जिसकी भरपाई भविष्य में संभव नहीं है। यदि सुप्रीम कोर्ट बाद में उसे बरी भी कर देता है, तो उसकी 45 वर्षों की लंबी प्रताड़ना और कैद के बदले कोई उचित मुआवजा नहीं दिया जा सकेगा। सुप्रीम कोर्ट ने अपराध की गंभीरता को स्वीकार करते हुए भी माना कि आरोपी द्वारा पिछले 45 वर्षों में झेली गई पीड़ा और उसकी खराब स्वास्थ्य स्थिति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
मामले की सुनवाई के दौरान झारखंड हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल ने देरी की वजह बताते हुए कहा कि आरोपी छह साल तक फरार रहे थे, जिसके कारण कार्यवाही में देरी हुई। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को नाकाफी माना और कहा कि इससे उस अवधि की व्याख्या नहीं होती जब 1991 में आरोप तय होने के बाद भी ट्रायल पूरा होने में 12 साल लग गए। पीठ ने स्पष्ट किया कि यह मामला केवल एक आरोपी की जमानत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश की आपराधिक न्याय व्यवस्था में मामलों के निपटारे में होने वाली भारी देरी पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। कोर्ट ने संबंधित अनुपालन हलफनामे की प्रति अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल के कार्यालय को सौंपने का निर्देश दिया है।
